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प्रश्नोत्तर

 

 

 

ए.टी.ज़ाकिर

 

 

 

देवदूत ने अपना लैपटॉप खोला,
फिर शाँत भाव से बोला,
तुम्हारे कर्मों का लेखा तैयार है |
अब स्वर्ग-नरक जहाँ भेजेंगे,
तुम्हें जाना होगा |
अपना कर्म फल वहीं
भुनाना होगा |
मैंने कहा –
मंज़ूर है !
बस एक इच्छा पूरी करवाईये,
कुछ पूछना है ?
जरा भगवान जी को बुलवाईये |
देवदूत ने मुस्कुरा के सिर हिलाया,
और उसी पल मैंने भगवान को सामने पाया |
मैंने कहा –
प्रभू !
मेरा एक ही सवाल है
जो बन गया मेरे जी का जंजाल है |
आपने केदारनाथ में ये क्या किया ?
होलसेल में लाखों का जीवन हर लिया |
माँ-बाप के साथ बच्चे भी
‘फ्री ऑफर’ में खप गये
और जानवरों के साथ
आदमी, औरत, बड़े-बूढ़े सब नप गये |
आपकी अक्ल पे क्या पड़ गया था पाला ?
जो भगवन, इतने सारे भक्तों को
एक साथ मार डाला |
भगवान बोले –
मैं क्यों मारता ? मैंने किसी को नहीं मारा
मनुष्य अपने कर्मों से है हारा |
पहाड़ों पर मैंने नहीं लगाया हाईडिल प्रोजैक्ट
नहीं काटे मैंने जंगल
बिना सोचे समझे उसका इम्पैक्ट |
वातावरण की गर्मी तो तुमने बढ़ाई है
हिमालय तो हिमालय, तुमने तो
ध्रुवों की भी बर्फ़ पिघलाई है |
अब प्रलय को तो आना ही है
और अपनी करनी का फल तुम्हें पाना ही है |
देखो सुनो –
मैंने तो नहीं कहा कि
लोगों को ठग के पैसा कमाओ
फिर मेरी पूजा का ढोंग करने
केदारनाथ जाओ |
मेरी पूजा करनी है
तो अच्छे इंसान बन के जियो
और बिना पूजा-पाठ के
मेरे आशीर्वाद का अमृत पियो |

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