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"पुष्प

 

अहो पुष्प तुम देख रहे हो किसकी राहें,
भावभंगिमा में करते हो किसकी चाहें;
पुष्पित हो तुम पूर्ण रूप से आज धरा पर,
मुग्ध हो रहे आज चाव से कौन छटा पर ।1।

 

लुभा रहे हो मधुकरों को अपने मधुर परागों से,
गुँजायमान हो तुम मधुपरियों की सुंदर रागों से;
कौन खुशी में वैभव का जीवन बिता रहे हो,
कौन खुशी में आज विश्व प्राणी को रीझा रहे हो ।2।

 

अपनी इस आभा पर तुम क्यों इतना इतराते,
अपने थोड़े से वैभव पर क्यों फूले नहीं समाते;
झूम रहे हो आज खुशी से तुम दूजों के श्रम से;
बिसरा बैठे हो उनको अपने यौवन के भ्रम से ।3।

 

मत भूलो तुम यह किंचित् होती है हरियाली,
चार दिनों के यौवन में होती है किंचित् खुशियाली;
आज हंसी के जीवन पर कल क्रंदन आता है,
आज बसन्त पर भी वृक्षों में कल पतझड़ आता है ।4।

 

मत इठलाओ क्षणभंगुर जीवन पर मेरे प्यारे,
पराग पंखुड़ी चार दिनों में हो जाएंगे न्यारे;
जितनी खुशबू फैला सकते चार दिनों में फैला लो,
हँसते खिलते खुशियाँ बाँटो जीवन अमर बना लो ।5।

 

नेकी कर कुंए में डालो और न जोड़ो नाता,
जग अपनी ज्वाला में जलता कोई किसे नहीं भाता;
स्वार्थ भाव से सन कर ही यह जग चलता जाता,
दूजों के श्रम बिन्दु को यह जग पीना चाहता ।6।

 

 

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

 

 

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