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राम नामी दोहे

 

 

दोहाकार : महावीर उत्तरांचली

 

देह जाय तक थाम ले, राम नाम की डोर
फैले तीनों लोक तक, इस डोरी के छोर //१. //

 

भक्तों में हैं कवि अमर, स्वामी तुलसीदास
'रामचरित मानस' रचा, राम भक्त ने ख़ास //२. //

 

राम-कृष्ण के काज पर, रीझे सकल जहान
दोनों हरि के नाम हैं, दोनों रूप महान //३. //

 

छूट गई मन की लगन, कहाँ मिलेंगे राम
पर नारी को देखकर, उपजा तन में काम //४. //

 

सियाराम समझे नहीं, कैसा है ये भेद
सोने का कैसा हिरन, हुआ न कुछ भी खेद //५. //

 

वाण लगा जब लखन को, हुए राम आधीर
मै भी त्यागूँ प्राण अब, रोते हैं रघुवीर //६. //

 

मेघनाद की गरजना, रावन का अभिमान
राम-लखन तोड़ा किये, वक़्त बड़ा बलवान //७. //

 

राम चले वनवास को, दशरथ ने दी जान
पछताई तब कैकयी, चूर हुआ अभिमान //८. //

 

रजा दशरथ के यहाँ, हुए राम अवतार
कौशल्या माँ धन्य है, किया जगत उद्धार //९. //

 

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कवि : महावीर उत्तरांचली

 

 

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