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रक्त पिपाषा

 

 

चहुँ ओर छाईं हैं,

धरा पर मौत की काली घटाएँ,

हर ओर बहती,

अपनों की ही रक़्त धाराएँ,

कलुषित-हृदय की,

स्वार्थ संग संक्रीर्ण इच्छाएँ,

ताकत के मद में,

मानवों पर राज करने की पिपाषाएँ,

इस हेतु, अगणित नारियों के,

सुहाग हैं उजड गए,

कितनें ही घरों के,

चिराग तक तो बुझ गए,

फिर भी नहीं है शान्त ज्वाला,

उन हृदय-पाषाण की,

शायद्, अभी भी अधर उनके,

रक्त प्यासे रह गए//

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सादर,
बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष"

 

 

 

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