swargvibha banner

होम रचनाकार कविता गज़ल गीत पुस्तक-समीक्षा कहानी आलेख E-Books

हाइकु शेर मुक्तक व्यंग्य क्षणिकाएं लघु-कथा विविध रचानाएँ आमंत्रित

press news political news paintings awards special edition softwares

 

 

आज अख़बार में एक ख़बर पढ़ी

रावण का कद छोटा हो गया है ।

मैं पढ़ कर थोड़ा हैरान हुआ

महंगाई ने भले ही रावण का कद

छोटा कर दिया हो

लेकिन रावणों के ग़लत मंसूबों पर

पानी फेरना अत्यंत कठिन काम है ।

रावण आज भी हमारे हृदय में बसता है ।

राम को दिल में रखने की जगह नहीं है ।

रावण के दस सिर हैं

और दस सिरों में से अनेक प्रकार के

विषय-विकार जन्म लेते हैं ।

आज के आधुनिक युग में,

विभीषण भी बहुत हैं

और रावण भी बहुत हैं

देश और धर्म की सेवा करनेवाले

विरले ही नज़र आते हैं ।

रावण वो विशाल वृक्ष है,

जिसकी जड़ों पर हर इंसान

अपने स्वार्थ का पानी डाल कर,

उसको पुष्टि देता है, ताक़त देता है ।

आज हम सब लोग रावण के हाथ

मज़बूत कर रहे हैं ।

कौन कहता है के रावण मर गया है,

उसका कद छोटा हो गया है ।

आप अपने इर्द-गिर्द देखेंगे तो

राम के भेस में रावण नज़र आयेंगे,

हम सभी रावण की ही भक्ति

रोज़ करते हैं ।

उसकी हर बुराई की नकल करते हैं,

उस पर अमल करते हैं ।

हमारे देश भारत में

प्रतिदिन सीता की इज्ज़त नीलाम होती है

और लोग सिर्फ़ तमाशा देखते हैं ।

आप कह सकते हैं, युग बदला है

लेकिन हमारा स्वभाव, हमारी बुरी आदतें

नहीं बदली ।

हमारे विषय-विकारों का दायरा,

रावण के कद से कई लाख गुणा बड़ा है ।

रावण हमारी प्रेरणा का साधन बन गया है ।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम के वचन

किताबों तक ही सीमित रह गये हैं

और हम सिर्फ़ रामराज की कल्पना ही

कर सकते हैं ।

आप ही बताईये रावण के भक्त

राम की भक्ति कैसे कर सकते हैं?

मन में राम को बसा लो या रावण को,

क्योंकि मन तो हमारे पास एक ही है ।

गुरूग्रंथ साहिब की गुरूबाणी में लिखा है

"एक लख पूत सवा लख नाती

तिस रावण के घर दीया न बाती"

तो साथीयो कहने का अर्थ यह है

बुराई पर अच्छाई कि विजय अवश्य होगी ।

ये बात आप स्वर्ण अक्षरों में लिख लो ।

 

 

HTML Comment Box is loading comments...