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पैरों में कब तक बांधोगे पाखी के रेशम की डोरी

 

अच्छा लगता है अब मुझको ओढ़ दुशाला तन्हा रहना !

न होने की आदत डालो, कभी तो होगा तन्हां रहना !

पैरों में कब तक बांधोगे पाखी के रेशम की डोरी

पिंजरे में सरकाना छोड़ो. नेह निवालों भरी कटोरी !

पिंजरे का दरवाज़ा खोलो .. द्रुत समीर संग है बहना !!

न होने की आदत डालो, कभी तो होगा तन्हां रहना !!

सुख की अभिलाषा ही न थी पीढा ने सिखलाया जीवन

अंतस हरी पीर की बगिया, बाहर हमने बिखराए रंग..!

हरेक एक परबत लांघ चुका हूं, एक और अब न कहना !!

अच्छा लगता है अब मुझको ओढ़ दुशाला तन्हा रहना !!

जब तक हूं तुम जी भर मुझ पर दाग लगा लो रंग बिरंगे

सिक्कों की लालच में तुम तो यूं ही हो जाते हो अंधे

सच्चाई के रंग के बारे में.. तुमसे मुझको नहीं कुछ कहना !

अच्छा लगता है अब मुझको ओढ़ दुशाला तन्हा रहना ! !

 

 

* गिरीश बिल्लोरे ’मुकुल’

 

 

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