tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






समर्पण

 

 

गहरे सागर से उद्याग्रसर सूर्य को देखकर-
लाज से उषा हो गई रक्त वर्ण।
उसकी लालिमा से हो उठा सम्पूर्ण वातावरण लाल लाल।
जान कर सूर्य-उषा मिलन, पक्षी करने लगे कलरव,
नदियाँ करने लगीं कल कल नाद,
बहने लगी शीतल वायु मन्द मन्द-
और पुष्पों की सुगन्ध से महक उठी सृष्टि।
वातावरण हो गया अत्यंत मनोरम-
प्रात: काल बन गया उषाकाल।
तीव्रता से बढते सूर्य ने कर लिया उषा को अंक बद्ध-
और उसने भी कर दिया निर्विरोध समर्पण।
समाप्त हो गया उसका अस्तित्व-
और सूर्य में समा गया उसका निजत्व।
अब बस शेष था सूर्य और उसकी तेजस्विता।
नि:शेष हो गई वातावरण की लालिमा,
शीतल वायु के मन्द मन्द झोंके परिवर्तित हो गये-
उष्ण थपेड़ों में।
पक्षियों के कलरव, नदियों का कलरव नाद-
खो गया दैनिन्दी कोलाहल में।

 

 


जयन्ती प्रसाद शर्मा

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...