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समझौता

 

इतने सालों से
तुम सिर्फ देती रही
प्रवंचना जीजीविषा की !
एहसास होते ही
इस खुरदरे सत्य को
कल्पना की गहरी तह....
डुबो देने की झटपटाहट !
घुटन का दर्द....
फिर भी...कभी कभी
जीना दुशवार है;
अलबत्ता समझौते का !

 

 

डा० टी० पी० शाजू

 

 

 

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