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सामयिक दोहे

 

 

संजीव

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जो रणछोड़ हुए उन्हें, दिया न हमने त्याग

किया श्रेष्ठता से सदा, युग-युग तक अनुराग।

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मैडम को अवसर मिला, नहीं गयीं क्या भाग?

त्यागा था पद अटल ने, किया नहीं अनुराग।

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शास्त्री जी ने भी किया, पद से तनिक न मोह

लक्ष्य हेतु पद छोड़ना, नहिं अपराध न द्रोह।

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केर-बेर ने मिलाये, स्वार्थ हेतु जब हाथ

छोड़ा जिसने पद विहँस, क्यों न उठाये माथ?

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करते हैं बदलाव की, जब-जब भी हम बात

पूर्व मानकों से करें, मूल्यांकन क्यों तात?

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विष को विष ही मारता, शूल निकाले शूल

समय न वह जब शूल ले, आप दीजिये फूल

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सहन असहमति को नहीं, करते जब हम-आप

तज सहिष्णुता को 'सलिल', करें व्यर्थ संताप
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संजीव ‘सलिल’  

 

 

 

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