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सन्यासी गाओ अमर गीत महान

 

 

शन्ति का अरण्य प्रदेशों में जन्मस्थान
रे खिंचती जीवात्मा को वस्तु अनजान
काम-क्रोध-लोभ के द्वंदों को छोड़ मुने,
तोड़ो बंधन जिनको समझे अपने जान
छेड़ों सन्यासी वह अमर गीत महान!!!

 

जग की लिप्सा तन की लिप्सा सताती
मोह पलित क्षणिक-पृथ्वी तुम्हे सोहाती
जिसकी आभा कनक बनाती मोह द्वार
तुम्हे संशय परिधान का नित्य देती दान
अत: सन्यासी गाओ अमर गीत महान

 

निज अंधकार को दूर कर लगा रे ध्यान
आज्ञा चक्र ज्योति जला परमात्मा मान
दृष्टि भ्रमित करता तह पर तह विस्तार
कर उज्जल ज्योति को हठ से हुई म्लान
छेड़ों सन्यासी वह अमर गीत महान!!!

 

तुम निज अस्तित्व को मुने भूल चुके हो
इन पञ्च तत्वों में उलझ के रह गये हो
तुम नही हो पञ्च तत्व कोई हो इनसे परे
दिशहीन विचर मत,मत बन रे अनजान
अविचल रहो सन्यासी छेड़ों गीत महान

 

ज्ञान शून्य वे,जिन्हें सूझते स्वप्न निःसार
सबसे रिश्ता ढूँढ बनाते झूठा इक परिवार
लिंगमुक्त आत्मा,तोड़ो श्रृंखला अविराम
निर्द्वंद निर्बद्ध आत्मा वीर धुनों वह तान
छेड़ों सन्यासी वह अमर गीत महान!!!

 

किसका शत्रु-मित्र ?सब माया के आयुक्त
नामहीन वह रूपहीन माया से है निर्मुक्त
जिसके बल माया रचती स्वप्नों के पाश
भज उसी सत्य को निरन्तर अपना मान
गाओ सन्यासी शिव अमर गीत महान!!!

 

विरले ही तत्वज्ञ ! करेंगे शेष तेरा उपहास
निंदा पाते नरश्रेष्ठ,धरो न मन कोई आस
मैं सब में सब मुझ में यही है रे परमानन्द
'तत्वमसि' -बना जिस से ये सारा जहान
छेड़ों सन्यासी एकत्व अमर गीत महान

 

 

--प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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