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एक शहीद और गुलाब ने

 

 

एक शहीद और गुलाब ने,
एक जैसे गुणों को पाया,
चुभन शूलों की सही,
पर गुलज़ार को महकाया।

 

न धूप में बना कुरूप,
काँटों में कोमल रहा,
ग्रीष्म शीत हर ऋतु में
खिलता वो पल-पल रहा।
आंधी, वर्षा, धूप में भी,
अस्तित्व को बचाया,
चुभन शूलों की सही,
पर गुलज़ार को महकाया।

 

डाली से टूट कर सजा,
कंठ का श्रृंगार बन,
युवा दिलों के काम आया,
प्रेम का उपहार बन।
स्वयं जुदा हो पौधे से,
दो दिलों को मिलाया,
चुभन शूलों की सही,
पर गुलज़ार को महकाया।

 

फिर मुरझा गया और खो गया,
वो पंखुडि़यों को लपेटे,
जिन्दा है वो इत्र बन,
महक शीशी में समेटे।
मरकर भी जिन्दा रहा,
और खुशबु को फैलाया,
चुभन शूलों की सही,
पर गुलज़ार को महकाया।

 


©डीजे

 

 

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