tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






शैशव का अवसान

 

 

shaishaw

 

"शैशव का अवसान, किशोरा-
वस्था का आरंभ, प्रिए!
अतिशाश्वत यह प्रेम, परम
प्राकृतिक, व्यर्थ है दंभ, प्रिए!

 

चुपके-चुपके बिन चाप, आगमन
ज्यों समीर का होता है,
उसी भाँति कैशोर्य प्रस्फुटन,
मनु का शैशव सोता है,

 

रंगहीन वह नीर, मेरे शैशव
का तब रंगीन हुआ,
जब कल तक का शिशुसम्राट
विकसा और याचक-दीन हुआ,

 

मेरा किशोर निर्वात परम,
तुम शीतल मंद बयार, प्रिए!
नैसर्गिक इस जीवजगत में
प्रीति, प्रेम और प्यार , प्रिए!

 

अतिविचित्र यह प्रेम, नहीं
केवल चेतन में परिलक्षित,
जड़ में भी हैं नीर-मृदा के
बंध सैकड़ों, संरक्षित,

 

हे नारी! मैं नर याचक,
बिन तेरी भिक्षा दीन,
सारी जगती तेरी क्रीड़ा,
बिना शक्ति शिव हीन,

 

पर क्या जगमाया रच पाती,
बिना मेरे शिव, शक्ति बता,
बिना किसी द्रुम अवलंबन के,
कहीं दिखे क्या तनी लता,

 

आओ! मिल कर एक बनें,
दें जग को नवसंतान,
व्यर्थ न कहते संत जगत में,
मानव जन्म महान,

 

मातु-पिता की सेवा पूजा,
स्वर्ग भरा परिवार,
आओ प्रेम करें, रच दें हम,
प्रेममयी संसार,

 

कुछ मूर्ख साधना कहते हैं,
बिन प्रेम, जगत में रहने को,
और आवरण ब्रह्मचर्य का,
ओढ़े फिरते कहने को,

 

इस संजय ने कलम लिया
और प्रेमग्रंथ लिखने ठानी,
मातु शारदा प्रेरक और
संरक्षक, औघड़ वरदानी,

 

कभी योग निद्रित विरक्त,तो
कभी भोगपथ अनुगामी,
वह गृहस्थ में भी सन्यासी,
कभी रुद्र वह अविरामी।।"

 

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

HTML Comment Box is loading comments...