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जब हो प्रभात कह शुभ प्रभात

 

 

लक्ष्मी सरस्वती गोविन्द के
कर दर्शन कर के भिन्न भाग
आलस की चादर परे फेंक
बिस्तर का झट कर परित्याग
नव रवि स्वागत में हो खुश ऐसे
जैसे धन मिलता अकस्मात
जब हो प्रभात कह शुभ प्रभात ||

 


जो आज काज करने उनकी
मन में बना फेहरिस्त
बना योजना बढ़ा चले
गंतव्य तरफ तू किश्त किश्त
लक्ष्य आँख चिड़िया की है
अर्जुन की भांति रहे ज्ञात
जब हो प्रभात कह शुभ प्रभात ||

 


साहस और दृढ़ संकल्प के किस्सों
से ये दुनिया ओत प्रोत
दया - धर्म का मूल है इनकी
हर प्रात: जला एक नई ज्योत
संशय जैसे शब्दों को
मार खींच के एक लात
जब हो प्रभात कह शुभ प्रभात ||

 


मात पिता गुरु ज्येष्ठों का
प्रातः समय कर चरण स्पर्श
इनके आशीर्वादों से ही
तू पाये मंजिल छू सके अर्श
आशा हर्ष उमंग से कर तू
आज के दिन की शुरुआत
जब हो प्रभात कह शुभ प्रभात ||

 


(कवि – देवकी नंदन मारू)

 

 

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