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कल स्वप्न में आई

 

कल सुपन में आई,फिर जरा सा मुस्कुराई।
नैनन की कटारी, हाय हिया पे चलाई।
हुई बात पुरानी, फ़िर कल आ दोहराई।
आस दिल जो सोई,फिर कल आकर जगाई।

 

 

तुम अक्सर मुझे लगीं,कोई उड़ते विहग सी।
तुम्हे प्यारी लगती,उड़ान उस शून्यता की।
कैसे कटी मेरी,तुम अब तक जान पाई?
तुम बिन रहा जैसे,देह बिना साँस पाई।

 

 

प्रणव मिश्र'तेजस'

 

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