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स्वप्न में स्वप्न

 

 

कल स्वप्न में इक स्वप्न आया
एक अलौकिक ज्योति जली।
क्षण भर में ही उस ज्योति की
यथा ध्यानमग्न दो मूर्ति फली।

 

 

रे जिनके अन्तस् बिलकुल ही
सूनेपन से लगता एकाकी थे।
युग-युग बीते पर उनके मानस
अब भी शून्यता के अपराधी थे

 

 

बिन अभिव्यक्ति और अपनों के
उनको सब कुछ नीरस लगा।
निराकार और साकार ने फिर
अपने तत्व का विकास किया।

 

 

सृष्टा ने फिर स्वयं को मानस से
सृष्टि रूप में परिवर्तित किया
और उसी सृष्टि पर उसने अपने
अंशज को भी अवतरित किया

 

 

अब दोनों के युगल मेल से सृष्टि
निर्बाध एकाएक चलने लगी।
और उसी के परिणाम के फलत:
सृष्टा-सृष्टि भी मुस्कुराने लगी

 

 

अब स्वप्न में मुझको संशय का
कोई कीड़ा-पतंगा काटने लगा
रे मैं यदि हूँ;तो आखिर हूँ कौन?
यह प्रश्न बार-बार उठने लगा।

 

 

मैं सुसुप्त हूँ तो यह सुसुप्त क्या
जाग्रत होता हूँ तो जीवन क्या?
जीवन में हूँ तो क्या ईश्वर हूँ
यदि ईश्वर हूँ तो मेरा मरण क्या?

 

 


©प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

 

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