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स्वर्ण पदक और पापा

 

 

आप बहुत खुश होते पापा।
स्वर्ण पदक आज मिला मुझको,
मैंने पहना था आज काला लबादा,
जैसे आपने देखा होगा
कभी किसी फिल्म में,
या फिर किसी पत्रिका
अथवा अखबार के रंगीन पृष्ठ पर।
जी हाँ,पापा हू-ब-हू वैसी ही
तस्वीर है मेरी।
सब लोग बहुत खुश हैं पापा,
एक आपके सिवाए।
आप भी शायद होंगे वहाँ,
जहाँ मेरी दृष्टि की पहुँच नहीं है।
आखिर क्यों न खुश होंगे?
क्योंकि कहते हैं कि
'पिता-गुरु की कामना होती है
कि उसका बेटा-शिष्य उससे आगे हो,
धनवान हो,बलवान हो,विद्यावान हो।'
आपको याद होगा वह दिन,
जब मेरा अक्षरारम्भ हुआ था,
मैंने पकड़ी थी तख्ती-खड़िया,
नन्हेँ-नन्हेँ कोमल हाथों में।
मेरे आड़े-तिरछे रेखा संसार को
देखकर, आपको हर्ष हुआ होगा?
आपको स्मरण है वह तमाचा?
जो मेरे कपोल पर जड़ा था आपने,
जब खेल रहा था मिट्टी,
भवानी मड़फी के सामने,
जर्जर नीम तले।
अब भी जब मैं देखता हूँ,
किसी बच्चे को मिट्टी खेलते।
गाल पर स्वमेव हथेली फिर जाती है,
स्वयं का एहसास दिलाने हेतु।
वह दिन तो अभी नहीं भूले होंगे?
जब मैंने सुनाया था पहाड़ा,
दस तक का,
त्रुटिहीन-सोल्लास पग दबाते हुए।
तब आपने दिए थे दो रुपए,
वह रुपया अब मेरे पास नहीं है,
क्योंकि मैंने मंगा लिए थे कम्पट।
मुझे वह दिन कभी नहीं भूलता,
जब आप लाए थे,
मेरी कक्षा पाँच की किताबें,
उनमें लगाया था आपने,
खाकी अखबार।
वो किताबें अभी तक महफूज़ हैं,
मेरे दिल की तरह अलमारी के कोने में,
आखिरी भेंट हैं न आपकी।
आज जब गले में पहना,
मैंने स्वर्ण पदक
तो मुझे लगा कि आप मुस्कारा रहे हैं,
पर यह शायद मेरा भ्रम था,
क्योंकि आप तो दुनिया छोड़कर तभी चले गए थे।
जब सीखा था शब्द जोड़ना,
अब तो लिख लेता हूँ कविता,कहानी,गीत,ग़ज़ल।
आपके आशीर्वाद से पापा।

 

 

 

 

पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू'

 

 

 

 

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