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तारीफ़

 

तेरे नूरे- ज़माल से जहाँ सारा रोशन है,
आशिक़ की फिक्र करना तेरी आदत है,
जग ज़ाहिर है ये, तभी तो हक़ीकत है,
तारीफ़ करना फिर भी मेरी ज़रूरत है ।

 

 

' रवीन्द्र '

 

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