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ताक रहा यह हृद् चकोर

 

tak raha

 

"ताक रहा यह हृद् चकोर,
चन्दा मुखड़ा आसक्त,
समझ गड़ी लज्जा से,
रति! प्रेमाभिव्यक्ति अव्यक्त,

 

 

माँग रहा रतिधन, बन याचक,
दाता मेरा काम,
शक्ति! शक्ति दो, माँगे शिव,
लड़ने जीवन संग्राम,

 

 

दो बाँहों का मांसल अवलंबन,
अधरों का स्पर्श, प्रिए!
घर्षण का सुख, आ समीप दो,
आतुर तन संघर्ष, प्रिए!

 

 

किसी अप्सरा के समान
सौन्दर्य समेटे, धनी मेरी,
प्रेम-वासना मध्य बैर,
ज्यों शत्रु प्रियतमा बनी मेरी,

 

 

अंग-अंग रस भरा टपकता,
मधुरस, मन चातक प्यासा,
देह भार बत्तीस श्रृंगार,
तौलूँ तोला-रत्ती-मासा,

 

 

बगुला बैठा संतध्यान में,
मीनप्राप्ति की प्रत्याशा,
मृतहृदय जागती पल-पल अब,
धड़कन पाने की अभिलाषा,

 

 

कटि सँकरी सौन्दर्य, दर्प तेरा
स्वाभाविक रति, भामा!
स्वप्न सत्य तब होंगे सब,
जब मुझे प्राप्त तुम हे, वामा!

 

 

अधर फड़कते, तन्तु तड़कते,
नयन कँटीले, कजरारे,
करने को हत् मेरा काम,
रति शस्त्र सैकड़ों संधारे,

 

 

वह कहाँ छिपाती यौवन धन,
जल चीर द्वीप आए सम्मुख,
जाने कब, मुझ काम को मिले,
रतिधन पाने का सद्सुख,

 

 

माथे पर काली बिन्दी,
भौंहें सम काजल की रेखा,
झुके नैन, सोए जलधर,
ज्यों दिवास्वप्न मैंने देखा,

 

 

सुघड़ गठी वह देह करे आकर्षित,
खिंचता मेरा मन,
हुआ सूर मैं सूर्यरश्मि से, निरख
कामिनी का यौवन,

 

 

हे शशि! तेरी किरणें शीतल,
हे पूर्णचन्द्र! दैदीप्य बदन,
लगे मधुर मक्खन छू लूँ,
छू कर मैं रति के कोमल तन।।"

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

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