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तुम्हारी उपस्थिति

 

 

नहीं, यह कोई मौसम की गलती नहीं थी
हवाएँ इतनी विपरीत न सही,
तब भी तीव्र ही थीं ।
अँधियारे मैदान सीने में विराट सुनसान लिए
तब भी विशाल आकाश को
विस्फारित दृष्टि से देखते थे,
नभ की रहस्यमय राहों पर
तब भी फूटते थे कितने चमकते तारे,
पर अन्तर यह था कि मैं तुम्हारे द्वार खड़ा
तुम्हारी उपस्थिति से सराबोर
मुस्करा रहा था।


मेरी मुस्कान को और उल्लासित करती,
तुमने भी हाथ में हाथ रख मेरी रेखाओं पर
अपनी रेखाएँ आच्छादित कर दीं
और मेरी संजीदा साँसों में तुमने
पल भर में नवोदित उत्तेजना भर दी।


अपनी प्रवृत्ति से बाधित
मैं मौन रहा, कुछ कह न सका,
पर जो मैं कह न सका,
कोमल स्पर्ष ने तुम्हारे तुरंत कह दिया।
उसी पल मेरे कितने अंतरित अँधियारे
विलीन हो गए थे,
फटे बादलों के पीछे से झाँकती चाँदनी
बावली-सी हँसती जा रही थी,
और स्वरित हवाएँ मेरे काव्य की पंक्तियाँ बनी,
उत्साहित
हर सांकल, हर छत को सर्वत्र छू आई थीं।


कुछ था तुम्हारे संतृप्त समर्पित स्पर्श में,
तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ बंधा रह गया,
रेखाएँ देर तक
रेखाओं में बंधी रहीं,
मेरी कविता भी जैसे पंक्तिओं को भूल,
तुम्हारी साँसों में खो गई ...
आने वाले पल की मधुर प्रतीक्षा में।


फिर भी जाने क्यूँ आशंका-ग्रस्त
इतनी अनुकूलता से अनभिज्ञ
मैं असमंजस में था...
पहले तो किसी की उपस्थिति में मैं
कभी इतना उन्मत्त न हुआ था,
पहले तो चाँदनी बारिश में धुल कर भी
कभी इतनी उजली न लगती थी,
संदीप्त सितारे झुक-झुक कर मुझसे
यूँ बतियाते न थे,
और हवाएँ बच्चों-सी किलकारियाँ करती
यूँ घास पर लोटती न थीं।


नहीं, नहीं,
यह कोई मौसम की गलती नहीं थी,
सारे वातावरण को उल्लसित करती
मेरे जीवन को संजीवित करती
यह तुम्हारी उपस्थिति थी!

 


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-- विजय निकोर

 

 

 

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