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वीर बढ़े चलो

 

 

अरे साहसी वीर तुम बढ़े चलो
कर्म के रणधीर तुम बढ़े चलो
खौलता खून शिराओं में बहाते
साहस की प्राचीर तुम गढ़े चलो

 

सिंह की नाद,सिंहनी के हो जने
क्यों कायरों की भाँति रे हो बने?
कफ़न बाँध कर निकलो रे शिवा
तुम तो मौत के दीवाने से हो लगे

 

दूर खड़ा पर्वत देख सीना ठोंके
मर-मर के करोगे क्या तुम जीके?
एक तबियत से ठोकर तो मार
धूल चटा,रे प्यारे मातु के हियके

 

इरादों को मुट्ठी में जकड़ कर
मत्थे मिट्टी लगा अकड़ कर
घुस जा सेना में तू अंगद सरीखे
मार वहीं उसे छाती पकड़ कर

 

युवा हो खून तुम इस भारत के
उसी आज़ाद शेखर भगत के
चरित्र में न गिर जाना कभी तुम
फिर सिर न उठे आगे मात के

 

तुम्ही को कर के दिखलाना है
रे 'विश्व-गुरु'देश को बनाना है
सुमिर शिव चलते जाना योगी
नया तुम्ही को कर दिखलाना है।

 


©प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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