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व्योम बाला अहिल्या--- कामिनी कामायनी


 


सुलक्षणा
परी
वा कल्पना
हतप्रभ वे
किंचित मौन
प्रगट में बोले
देवी तुम कौन
तरूणी
तन्वंगी
पहचानकर पथिक को
लंबी सॉस भरती हुई
निहार कर क्षितिज को
बोली कुछ भी नहीं
यात्री परेशान था
कुछ कुछ हैरान सा
देखता रहा शून्य में
प्रकृति की नई खोज को
कौन है यह उर्वशी
तेज से भरी हुई
कितना विश्वास इसे
अपने अस्तित्व पर
बोल उठी रूपसी
र्निनिमेष देखती उसे
जानना तो जान ले
भेद खोलती हूॅ मैं
पहचान ले पथिक मुझे
मैं ही थी पाषाण खंड
पाप किसी और का
युग युग सहती रही
युवती की आह पर
चौंक गया था पुरूष
इतनी सदी के बाद भी
जुल्म उसे याद था
मानिनी के ज्ञान से
वह भी बडा क्षुब्ध था
उठ खडी है नारी अब
फाडकर विराट हिम
चौंक कर वह रह गया था
समय की ताकत देखकर
ओम की तलाश में
ये व्योम छानने चली
वाह रे तपस्विनी
तेरा तपन ही ठीक था
उठ नहीं पाया था फिर
झुकी हुई गर्दन और सिर ।

 

 

 

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