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वाद

 

 

लोग फैलाते हैं वितंडावाद, करते हैं परिवाद-
और सहज ही अपने कथन का कर देते हैं प्रतिवाद।
आप चाहते हैं रहना निर्विवाद-
लेकिन लोग फँसा ही देते है विवादों में।
वैसे भी वादों ने हर क्षेत्र में बना ली है बढ़त।
परम्परागत वादों के अतिरिक्त नये नये वाद आ गये हैं अस्तित्व में।
यथा वंशवाद, परिवार वाद, भाई भतीजा वाद-
जो कर रहे हैं भारतीय राजनीति को प्रदूषित।
इन वादों से परे आतंकवाद जो है परिणाम-
अविवेकी पड़ौसी द्धारा लगाई विद्देष की आग का,
हो गया है अति भयावह।
इसकी तपिश से नही बच पा रहा है इसका पोषक भी।
विस्तारित हो रहा है सुरसा के मुख जैसा।
जाति धर्म और स्वजनों को लीलता हुआ-
यह हो गया है वैश्विक।
नहीं बुझेगी इसकी आग परम्परागत दमकलों की फुहारों से।
अपेक्षित है महावृष्टि इसके शमन को-
जो सम्भव हो सकेगी केवल ईश्वरीय कृपा से।

 

 


जयन्ती प्रसाद शर्मा

 

 

 

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