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वह भिक्षुणी

 

 

'भगवान के नाम कुछ दे'
ऐसी चिल्ला रही थी आज
उस बस स्टैंड के सामने
वह भिक्षुणी।

 

करुण स्वर में चिल्ला रही है
मुझसे रहा न गया
जेब टटोली
दो रुपये दिए
नहीं जानता ये मेरा
दान है या कर्तव्य
बहुत खुश थी दो रुपये से
उसे पौसे मिले
और मेरे मन को मिला समाधान।

 

बस बहुत देर से आई
मैं वहीं ख्डा रहा
शायद बीस मिनट बाद
वही भिक्षुणी फिर से आई
वहीं जहाँ मैं खडा हूँ
वही जगह है
और वही भिक्षुणी है।
मुझे बहुत अच्छा याद है सबकुछ
मेरी याददाश सही है
ऐसी बात नहीं
क्योंकि मैने पैसे दिए है।

 

फिर उसने मुझसे पैसे माँगा
मेरा क्रोध उबला
डाँटते हुए कहा,
'अभी तो दिया कितनी बार दूँ'
उसने नकारात्मक दृष्टि से देखा
न जाने मन में क्या सोच रही थी।

 

पश्चात मुझे पश्चाताप हुआ
सोचता रहा
उसने सिर्फ घरबार ही नहीं
याददाश भी खोया है।

 

 

- श्री सुनील कुमार परीट

 

 

 

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