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वन गमन

 

खर दूषण गए, ना खलिश गयी,
स्वर्ण- पुरी अभी अविजित रही ।
सहस्त्र चतुर्दश असुर सेन सहित,
बाली त्रिशिरा का वध शेष अभी ।
परिस्थिति का नहीं सही आकलन,
पराक्रमशुल्का जन्म भी हुआ नहीं ।
चन्द्रमौलि का चाप रहा अखंडित,
वनगमन राम का अभी हुआ नहीं ।

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

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