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विरह

 

 

अब विरह अग्निशिखा सी उद्दीप्त हो उठी है।
निस्संगता , मन कल्पना कुंठित हो उठी है।
चाहने लगा भूलने की प्रक्रिया शुरू हो,
भीतर अमावश रात्रि जाग्रत हो उठी है।

 

 

अब उसका मुखड़ा कही और जा ओट ले,
दृढ़ता-कठोरता पाषाण से मन सीख ले।
भूलना भी एक कला है , और निपुण हूँ,
अति अच्छी नही,प्रेयसी तू जा सीख ले।

 

 

 

प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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