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विरोध - आभास

 

मुरली की तान सुनाते हो,
चितवन के बाण चलाते हो,
चीज़ जो है सदा से तुम्हारी,
चुरा के चित्तचोर कहलाते हो।

 

तरंगें तुम से जो निकलती हैं ,
साजों का जाल ऐसा बुनती हैं,
मोह कर मन को बदलती हैं ,
जालसाज़ी भी ना ये खलती है।

 

ना करके भी सब कर गुज़रते हो ,
पल भर में सुर - ताल बदलते हो,
काल यवन को पीठ दिखा रण में,
पार्थ को रण का पाठ पढ़ाते हो ।

 

रहते तो हो तुम सर्वत्र सदा ,
कहने को आते हो यदा कदा,
त्रेता के राम रहे सही विपदा,
कोरी बातों से यूँ बहलाते हो।

 

द्वन्द रहित सबको तुम करते ,
पर खुद से संघर्ष सिखलाते हो,
सब के हृदय को मोहित करके,
फिर संशय का नाश कराते हो ।

 

परम हितैषी सखा और बन्धु ,
अति अनुरागी निर्मल बैरागी ,
सगुण सुलभ निर्गुण अगोचर ,
जब जो मनभाये बन जाते हो।

 

उठा कर तुम गले लगाते हो ,
गिराने को कभी उठवाते हो ,
जग में कोई न संबंधी तुम्हारा,
खुद स्वयं का वंश मिटवाते हो।

 

क्या कंस तुम्हारा सगा न था ,
फिर क्यूँ उसे तुमने स्वयं हता ,
वैमनस्य था अगर दोष उसका ,
स्वयं में क्यूँ प्रवेश करवाते हो ।

 

मित्र हृदय की दुर्बलता पर हँसते,
हँसने वाले को लेकिन तुम कसते ,
सर्वज्ञ शाश्वत प्रथित पुरुष सनातन,
स्वयं को कह कर अहं दिखाते हो ।

 

तुम्हारा कुछ भी दख़ल नहीं,
दीन धरम और ईमान यही,
जिसका जैसा संचित कर्मकोष,
तैसा सच्चिदाभास कराते हो ।

 

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

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