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"आ जा, आ जा, ये है मैख़ाना, प्यार मिलता है

 

maikada

 

"आ जा, आ जा, ये है मैख़ाना, प्यार मिलता है,
टूटे दिल को सुक़ून और क़रार मिलता है,
आ जा, आ जा, ये है मैख़ाना, प्यार मिलता है,

 

 

मैक़दे में कभी मंदिर, कभी मस्ज़िद थे मिले,
सभी क़ाफ़िर, मिरे मुरीद, मुज़ाहिद थे मिले,
असल इबादत, यहाँ बेशुमार मिलता है,
आ जा, आ जा, ये है मैख़ाना, प्यार मिलता है,

 

 

वहाँ जीने का सही-वाज़िब सबब मुफ़्त मिले,
और पीने का असल उम्दा अदब मुफ़्त मिले,
सब का, सब पर, यहाँ पे एतबार मिलता है,
आ जा, आ जा, ये है मैख़ाना, प्यार मिलता है,

 

 

जिसने देखा मुझे पीते, मुझे बदनाम किया,
कमदिमागों ने ज़माने में मेरा नाम किया,
यहाँ साक़ी की शक़्ल में क़रार मिलता है,
आ जा, आ जा, ये है मैख़ाना, प्यार मिलता है,

 

 

यहाँ की रस्म है, जो आए, वो शराब पिए,
और रुख़सत यहाँ से हो, जिगर हिज़ाब लिए,
ज़रा आओ तो! यहाँ वस्लेयार मिलता है,
आ जा, आ जा, ये है मैख़ाना, प्यार मिलता है,

 

 

वफ़ा का जाम मिले, पी के सूफ़ियाने में जी,
'राज़' तू मैक़दे में आ के, आशियाने में जी,
दिलों को जोड़े आतिशतर बहार मिलता है,
आ जा, आ जा, ये है मैख़ाना, प्यार मिलता है।।"

 

 

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

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