युद्ध करो

                                       

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युद्ध करो

 

 

कह शांति शांति की महिमा को न बुलाओ गत के बीते कल को
फंस अमृत के मोह पाश मे छोड़ न दो छद्म भरे हलाहल को
पूछेगा इतिहास स्वयं ही होगा जब सब कर्म निरीक्षण
पान किया केवल अमिय को भूल गये क्यो विष के बल को
जो भी हुए युद्घ धरती पर उनकी भी कुछ सुनो कहानी
कितना मरु हुआ भूमि का भाग कितनी धरा शेष है धानी
कहां धर्म शस्त्र के बल उतरा कहां बुलाने पर आया है
कहां शूर की धरती छोड़ निर्बल की भू पर अाया है
रक्त वही समिधा है जिससे यज्ञ की आहुति पूर्ण हुयी है
श्रमजल से ही नम होकर के शत्रु शिलायें चूर्ण हुयी है
शेष समय अब कहां रहा कि सहिष्णु बने संवाद करें
शांति मार्ग उपयुक्त कौन है जिस पर बैठ विवाद करें
पावक की लपटें है कहती बन केसरिया जग पर छाओ
शुद्ध करो हर तत्व धरा का चुन चुन हर कुंजो मे जाओ
कायरता है कलंक जाति का उभरे छिपा हुआ पुरुषार्थ
विजय , सृजन ,संघर्ष घोर यह केवल जीवन निहितार्थ
रोक रही रचना जो गति को उसे गलाओ शुद्ध करो
ध्येय पथ मे जहां रोध हो संधि नही बस युद्घ करो

 

 

 

अनूप सिहं

 

 

 

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