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दौड़ने का अभ्यास

 

 

- अंकुश्री

 


हरेकृष्ण बाबू को सुबह-सुबह दौड़ते देख कर अंसारी साहेब विष्मित हो गये. पूछने पर कमर को लाठी के सहारे सीधी करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘दौड़ने का अभ्यास कर रहा हॅू.’’
‘‘रिटायरमेंट के बाद इस बुढ़ापे में दौड़ने का अभ्यास ?’’ अंसाारी साहेब की निगाहें हरेकृष्ण बाबू की उजली मूछों के नीचे चली गयी थी, जहां मुंह का अकेला दांत बत्तीसी की याद दिला रहा था.
‘‘सरकारी कर्मचारियों की यही तो उम्र है, जब दौड़ने का अभ्यास जरूरी हो जाता है. इससे सीढ़ियां चढ़ने में सांस नहीं फूलेंगी - - -.’’

 


‘‘रिटायरमेंट के बाद सीढ़ियां और सांस - - -?’’ अंसारी साहेब कुछ समझ नहीं पा रहे थे.


हरेकृष्ण बाबू एक हाथ से लाठी थामे हुए थे, दूसरे हाथ से माथा ठोकते हुए कहा, ‘‘सेवानिवृति के बाद पेंषन, भविष्य निधि, आदि के लिये कार्यालयों का चक्कर लगाना पड़ता है.’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘अंसारी साहेब, जानते ही हैं, बड़े-बड़े कार्यालयों की ऊंचाई भी अधिक होती है. विगत तीन वर्षों से कार्यालयों में दौड़ रहा हॅू. लेकिन अभी तक न तो मेरा पेंषन तय हो पाया है और न भविष्य निधि की राषि मिल सकी है. पता न अभी और कब तक दौड़ना पड़े. इसीलिये दौड़ने का अभ्यास शुरू कर दिया हॅू - - -.’’

 


अंसारी साहेब की सेवानिवृति में अभी दो वर्ष देर थी. हरेकृष्ण बाबू की बात सुन कर वे भी उनके साथ दौड़ने लगे.

 

 

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