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उन्मूलन

 

 

- अंकुश्री
समचार पत्रों में उसका नाम छप चुका था. अब वह जिस लड़के के दरवाजे पर जायेगा, वहां उसे बैठने नहीं दिया जायेगा. पर जवान बेटी का भार वह कब तक सिर पर रखे रहेगा ? बेटी भले बोझ नहीं थी, मगर उसका कुंआरापन तो बोझ था ही. पड़ोसियों की उलहना वह भले अनुसनी करता रहा है, मगर पत्नी की बात कब तक अनसुनी कर सकता है. घर में एक तरफ कुंआरी जवान बेटी थी तो दूसरी तरफ पत्नी की उलाहना. वह घर में कहां रहे ?
पार्क से निकल कर वह सड़क पर आ गया. किनारे की एक दुकान पर चाय के लिये बैठा ही था कि उसे महेश बाबू आते दिखायी पड़ गये. उसने झट से अपना मुंह दूसरी ओर फेर लिया. लेकिन यह क्या ? वे आकर उसी के सामने बैठ गये.
उसने सोचा, पता नहीं महेश बाबू उसकी करतूत का कितना बुरा मान गये हों. उन्होंने अकेला ही तो ऐसा नहीं किया था. हर लड़का वाला वर्षों दौड़ाने के बाद भी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कह पाता. महेश बाबू ने तीसरी बैठक में ही अपनी मांग की सूची पेश कर दी थी. दरअसल सूची उसी ने मांगी थी. लेकिन सूची देख कर वह गुस्से से तमतमा गया था और वहां से उठ कर सीधे दहेज उन्मूलन समिति के पास चला गया था. दूसरे दिन समाचार पत्रों में सूर्खियों में समाचार भी छप गया. लेकिन साक्ष्य के अभाव में महेश बाबू के विरुद्ध कुछ नहीं किया जा सका.
महेश बाबू के सामने वह नहीं बैठ सका. बिना चाय पिये ही चाय का पैसा देकर वह दुकान से भाग गया. लेकिन भागने के बावजूद उसकी परेशानी कम नहीं हो पायी. उसे लगा कि महेश बाबू उसके पीछे-पीछे चले आ रहे हैं. उसने कई बार पीछे मुड़ कर देखा भी. मगर महेश बाबू नहीं थे.
फिर भी वह तेजी से भागता जा रहा था. भागते-भागते बहुत थक गया तो एक होटल में घुस गया. एक तरफ बैठते हुए उसने लगभग चिलाते हुए कहा, ‘‘एक कड़क चाय !’’

 

 

 

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