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Dharmendra Mishra

 

 

1-दर्प है जिन्हे अपनी सख्सियत पे इक दिन राख़ के ढेर होजाएंगे .
हमारी सख्सियत तो फिजा है फिजा में ही रहेंगे .
2-
गर मैंने तुझे गम दिए मेरा गम मुझे लौटा दे.
खामखा मेरी मोहब्बत को इल्जाम न दे.
3-
मोहब्बत में खाया धोखा,दीवाना कहे जमाना .
कुबूल है -कुबूल है कह, फिर मुकर गई रुखसाना.
4-
दिल के दरवाजे बंद न कर दूर होके भी तेरे करीब होते है .
महसूस कर के देख मेरी रूह रात भर तेरे साथ ही सोती है
5-
ग़ालिब को गजल किसने सिखाया ,खैर जिसने भी सिखाया क्या खूब सिखाया .
जिस मर्ज की दवा खुदा के पास भी न थी उस मर्ज की दवा ग़ालिब को बनाया .
6-
मरते न तो करते क्या जो भी मिला जीवन में सब कुछ कर लिया .
कौन अपना कौन पराया भला इस दुनिया में सब से मोहब्बत कर लिया.
7-ऐ खुदा तेरी खुदाई पर कोई याकि करे या न करे मै करता हूँ.
इस जिंदगी से मिले हर जख्म को तेरी रजा समझ सीने में सहेज कर रखता हूँ.
8-
मुझे अपनी नहीं तेरी फिकर रहती है ,अँधेरे को भी आज- कल रोशनी की जुस्तजू रहती है.
9-
अजीब कशमकश है वो दिल की दास्ता बयां नहीं करते.हमने किया इज़हार वो ऐतबार नहीं करते.
10-
मैं अपने वजूद में हूँ , अमीर हूँ , गरीब हूँ ,मगर अभी भी जिन्दा हूँ .

11-
आदत से बड़ी चीज तो मैंने जिंदगी में ना देखी,गम हो चाहे हजार,आदत हो तो बिना महसूस किये जिंदगी कटते देखी.
12-
मैं अपने वजूद में हूँ , अमीर हूँ , गरीब हूँ ,मगर अभी भी जिन्दा हूँ .
13-
हम न सही कोई और ही सही शुक्र है आपको वफ़ा तो हुई.यही तो हमने माँगा था खुदा से आपकी वफ़ा से हमें कोई शिकायत नहीं.
14-
दरिया संग बह सागर में मिलना चाहु ,प्यार के दो मीठे बोल ,बोल के हर दिल में रहना चाहूँ.
15-
फूल बन गए सितारे ,असमा के बदले -बदले से नज़ारे ,ये धरती ये अम्बर सब है सजदे में तुम्हारे.
16-
जिंदगी में खुसी तो बहुत थी उम्र ने तलासी ली तो चंद लम्हे ही बरामद हुऐ वो भी हमने आप को दे दीये.
17-
धृतपूरित मन में निर्वाद रूपी कोप बढ़ने लगा ,अमर्ष विशद बन स्मृतिपटल में बहने लगा .
18-
धृतपूरित मन में निर्वाद रूपी कोप बढ़ने लगा ,अमर्ष विषाद बन स्मृतिपटल में बहने लगा .
19-
नजराने लाये थे हम ने भी तेरे दरबार में ,सायद कुछ कमी रह गई . मेरी दुआ छोड़ तुझे सब की दुआ कुबूल होगई.
20
दिल के रकबे पे तेरा नाम लिख,फिरता हूँफरियादी की तरह . इंसाफ तो अब मिलने से रहा,ख्याल रखना इस दिल का अपने ही दिल की तरह.
21-अमीरो के मोहल्ले में मेरा माकन न सही ,फिर भी अक्सर जाया करता हूँ.अभी भी मै जिन्दा हूँ इस बात का ऐहसास खुद को ही दिलाया करता हूँ.

22-
दुर्गम पथ पर चलने वाला वो सम्बल मेरा टूट गया ,अविचल,अविरल रहने वाला अंदर से ही टूट गया.
23-
मन में उपजित वेदना ,मन ही मन में बहती है , चुपरहकर अंतर्मन में ,कुछ मौन व्यथा कहती है.
24-
मजबूर मजलूम थे हम कभी मुगलो कभी अंग्रेजो के अत्याचारों से,हे माँ हिंदी वो तू ही थी जिसके सम्प्रेषण से हम आजाद हुए सदियों की गुलामी से.
25-
मृगलोचन से नयन तुम्हारे ,ये रूप कहा से लायी हो .हे !चंद्रवासनी अम्बरधरणी,इस भूमि पर क्यों आयी हो .
26-
तू मेरी जिंदगी में हर पल शामिल ,मै तेरी जिंदगी में कही भी नहीं .इक तरफ़ा प्यार की कहानी थी ,चंद लफ्जो की जुबानी थी ,अब सायद वो भी नहीं .
27-
जन्मान्ध कापुरुष होते है जो ठकुरसुहाती बाते करते है .धीर,वीर,तो जननी ,जन्मभूमि पर मरने की बाते करते है .
28-
अकार्य ही जीवन न व्यर्थ करो ,यथाशक्ति प्रयत्न करो,कर्मनिरत हो कर्म करो ,मत घबराओ संघर्ष करो.
29-
कोई फूट- फूट कर रोता है ,कोई सिसकिया ले कर रोता है .मगर टुटा हुआ दिल अंदर ही अंदर रोता है .
30-
मेरी नजरो में तू खुद को तलाशा कर ,तेरे शिव इन्हे और कोई समझा नहीं .मेरे दिल में सिर्फ तू है इस बात से अब तू भी बेखबर नहीं.
31-
हमें सुला कर ये कौन प्यार की बाते कर रहा,चाँद आसमा से क्या कह रहा.जरा सुनो तो कही हमारी ही बाते तो नहीं कर रहा.
32-
सागर की लहरों संग सर्द हवायें बह रही है धीरे-धीरे . सूरज की सुर्ख लाल निगाहेँ दूर छितिज में डूब रही है धीरे –धीरे.
33-
तुझे सारा जँहा मिल गया,मैंने अपना ही जँहा ही खो दिया. हर नजर उठी है बस तेरी तारीफ में,ऐ चाँद मैंने तेरी तरफ अब देखना ही छोड़ दिया.
34-
कोई और न मिले तो खुद से मोहब्बत करलेना ,आखिर वो तुम ही तो थे जिसने हर दर्द को हँसते हुए झेला .
35-
कहने को तो हर बात पे एक नया काफिया कह दे लेकिन क्या करे हमारी मोहब्बत इतनी सस्ती नहीं जो सरे बाजार रख दे.
36-
निगाहो से क़त्ल कर दे वो खंजर मेरे दिल से होके गुजरा .
तकलीफ हुई जब वो खंजर कही और से भी होके गुजरा .
37-
दिल है मेरा कांच का टुकड़ा जो चुभता है हर बक्त मेरे सीने में.
आग लगे इस जालिम वफ़ा को जो सोने न दे मुझे रातो में.
38-
मेरे अक्श को ढूढ़ते रहो कही न पाओगे.मैं कही हूँ ही नहीं तो कहा पाओगे .
मैं तो खाव्ब हु नजर कहाँ आता हूँ ,रोज -२ किसी इक के ख्वाब में कहाँ आता हूँ.
39-
आग कहीं और लगी है ,धुआँ कही और उठ रहा है .ये किसकी कारगुजारिश है ,जो धुँए के रुख को मोड़ रहा है.







Dharmendra Mishra

 

 

 

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