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देवी नागरानी

मुक्तक

 

1
पढ़के मैंने कमाल देख लिया
जैसे तेरा जमाल देख लिया
कैसा होता है लिखना मुक्तक, वो
फन ये इक बेमिसाल देख लिया.
2.
ये है अलबेली चाल राहों की
या शरारत कोई निगाहों की
बस्तियाँ सब की सब नशे में हैं
है ज़रूरत उन्हें तो बाहों की.
3
इतना बालिग़-नज़र हुआ है वो
इल्म नीलाम कर रहा है वो
है उजालों की कशमकश फिर भी
काले बाज़ार में खड़ा है वो.
4.
रस्म कुछ ऐसी निभाकर दोस्ती की वो गया
जाते जाते दुश्मनी के बीज जैसे बो गया
सच सिखाने आया मक्कारों की बस्ती में वही
झूठ की खुद ओढ़कर ‘देवी’ रिदा वो सो गया

5
यूं तो गूंगी ज़बान है तेरी
हर तमन्ना जवान है तेरी
कुछ तो काला है दाल में शायद
लड़खड़ाती ज़ुबान है तेरी.
6
हमें भी बर्क़ की शिद्दत को आज़माना चाहिए
नए सिरे से नशेमान को फिर सजना है
मुझे चिढ़ाती है वो सामने खड़ी होकर
उसे भी आईना-औक़ात का दिखाना है
7
पटाखों की आवाज़ सुनकर डरा है
जो बारूद के ढेर पर खुद खड़ा है
खिलौना समझकर थे बचपन में खेले
वो बंदूकें थीं ये पता अब चला है

8
चल गई रात ये आज़ाबों की
कस्में देकर के झूठे ख्वाबों की
चाहतों की कली उदास हुई
उम्र जब भी ढली गुलाबों की
9
कभी रेत पर घर बनाकर तो देखो
बिखरने का पल भर में मँजर तो देखो
किनारे पे आकर खडी मौन ‘देवी’
जो मन में मचा है बवँडर तो देखो
10
साथ लेके मैं सबको जीता हूँ
मैं ही कुरआन, मैं ही गीता हूं
है अयोध्या बसी मेरे मन में
वो तो है राम, मैं तो सीता हूं
11
सुनामी की जद में रही जिंदगानी
की दुनिया को उसने बहाने की ठानी
भयानक वो मँजर, वो खूँखार लहरें
क़यामत बना था समंदर का पानी.
12
दलित पीड़ितों की है सदियों पुरानी
विवशता की बेदी में जकड़ी कहानी
गई बीत सदियाँ न बदलाव आया
व्यवस्था भी बर्दाश्त करती ग़ुलामी
13
राह रौशन सभी की करते हैं
हम चरागों में खून भरते हैं
क्यों भला राहगीर भटकेंगे
नूर ही नूर से गुजरते हैं
14
बज रही दूर यूं तो शहनाई
तर्ज़ ये मर्सिये की क्यों आई
कैसी खुशियाँ ये कैसा मातम है
वक़्त बनकर रहा तमाशाई
15
अनबुझी प्यास रूह की है ग़ज़ल
खुश्क होठों की तिश्नगी है ग़ज़ल
इक इबादत से कम नहीं हर्गिज़
बंदगी सी मुझे लगी है ग़ज़ल
16
इस देश से ग़रीबी हट कर न हट सकेगी
मज़बूत उसकी जड़ है, हिल कर न वो हिलेगी
धनवान और भी कुछ, धनवान हो रहा है
मुफ़लिस की ज़िंदगानी, ग़ुरबत में ही कटेगी 3-4
17
कर गई लौ दर्दे-दिल की इस तरह रौशन जहाँ
कौंधती है बादलों में जिस तरह बर्क़े-तपाँ
साँस का ईंधन जलाया तब कहीं वो लौ जली
देखकर जिसको तड़पती रात की बेचैनियाँ
18
लहू से लिखी वीरता की कहानी
सुनाती सियाही क़लम की ज़ुबानी
रक़ीबों के सीने पे आघात सहकर
रही मुस्करती जवानी दिवानी
19
तुम अंधेरो में दीपक जलाओ
क्यों न जश्ने-चरागां मनाओ
रक्खो अपने ज़मीरों को रौशन
लौ न ईमान की तुम बुझाओ
20
उँगली तो दोस्तों पे उठाया न कीजिये
ये दोस्ती है, ऐसे निभाया न कीजिये
डर है के रूठ जाऐ न सब आपसे कहीं
आईना दोस्तों को दिखाया न कीजिये.
21
अब न उम्मीद है बहानों की
है खबर जिसको अब ठिकानों की
किसकी हम लें पनाह ऐसे में
बर्क़ है दोस्त बदगुमानों की
22
वो इस मामले की जड़ों तक गई है
क्यों आबादियां उसकी दुश्मन बनी है
बसाया है घर उसने वीरनियों में
निहाँ उसमें शायद उसीकी खुशी है
23
दीप खुशियों के जल रहे हरसूँ
फूल गुलशन में खिल उठे हरसूँ
एक इंसानियत की खुशबू से
यारो पहचाने हम गए हरसूँ
24
किस्मतें जब रकीब बनती हैं
ज़िंदगानी सलीब लगती हैं
कोशिशों के लगे है मेले यूँ
रात दिन उनकी भीड़ रहती हैं.
25
लगी चोट पत्थर की, सहला रही हूँ
न जाने क्यों फूलों से कतरा रही हूँ
बड़ी मुश्किलों से सुकूं कुछ मिला है
ना आवाज़ देना मैं घबरा रही हूँ.
26
झूठ के साथ सच भी पलते हैं
हम यकीनों गुमाँ में रहते हैं.
ठोकरों से बचाके दुनियाँ की
खुद को महफूज यूं भी रखते हैं.
27
विरोधी इन ईंटों को वो झेलती है
ये कमजोर दीवार की बेबसी है
सुलह मशवरा कोई दे भी तो क्या दे
लड़ाई ये दीवार और ईंट की है
28
अंजान रास्तों पे कभी डोलती नहीं
अपने इन पावों के निशां मैं छोड़ती नहीं
सदमे उठा उठा के हुई ज़िंदगी निढाल
उनका हिसाब अब कभी मैं जोड़ती नहीं
30
ज़िंदगी कैसे दिन दिखाती है
जब ज़मीरों को आज़माती है.
कल नचाते थे सबको उँगली पर
आज दुनिया उन्हें नचाती है.
31
ग़म के साए में खुशी को मुसकराना आ गया
उलझनों में राहतों को जीना जब से आ गया
रह रहे हैं काँच के घर में जहां पत्थर के लोग
ठेस ठोकर से उन्हें खुद को बचाना आ गया

32
तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही है
दम तोड़ती हुई सी बस शमा जल रही है.१ ४२
ऐसे न डूबते हम पहले जो थाम लेते
मौजों के गोद में अब कश्ती उछल रही है.३
33
कैसी हवा चली है मौसम बदल रहे हैं
अब छाँव में शजर भी कुछ ऐसे जल रहे हैं
चाहत, वफ़ा, मुहब्बत बाज़ार बन गई अब
रिश्ते तमाम जाकर सिक्कों में ढल रहे हैं
34
ढलान पर हैं तेरे पाँव तू संभल कर चल
बुलंदियों पे नज़र रख, न यूं मचल कर चल
हैं मंज़िलों से बहुत दूर रास्ते ‘देवी’
है आशना जो तू उनसे क़दम बदल कर चल

 

 


देवी नागरानी

 

 

 

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