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कवि डी एम मिश्र

 

 

1

बहुत –सा काम बंदों का स्‍वयं भगवान करता है

मगर तारीफ अपने मुह से हर नादान करता है

बडे लोगों की बातें भी बडी होती हैं क्‍या शक है

सरल बातें तो बस कोई सरल इन्‍सान करता है ।

 

 

 

2
फूल लुटाया करते खुशबू झरते हैं खामोश मगर

पेड सभी को फल देते है झरते है खामोश मगर
नीलगगन के महाशून्‍य में दबी हुई कि‍तनी आवाजें

ऑसू महाकाव्‍य रच जाते बहते हैं खामोश मगर ।



3 जैसे वो पंचतत्‍व में वि‍लीन हो गये

उनके हरेक शेर बेहतरीन हो गये
जब वो हमारे साथ थे तो दो टके के थे
अब जब नहीं हैं वो तो नामचीन हो गये ।


4
जंगल में रास्‍ता बनाना पडता है
कॉटों से भी हाथ मि‍लाना पडता है
मुर्दो से भी रि‍श्‍ते रखने पडते हैं
श्‍मसान में दि‍या जलाना पडता है।

 

5

नई खुशि‍यॉ , नई खुशबू , बहारें भी नई लाया

गि‍ने दि‍न तीन सौ पैंसठ कहीं तब जन्‍मदि‍न आया

तुम्‍हारे नाम की कि‍रणें , हमारे प्राण के नभ पर

मचल कर आ गयीं जब से नया सूरज नि‍कल आया ।



6
तुम्‍हारे रूप की खुश्बूू हमारे प्‍यार का मधुवन
लगे बारह महीने बस यहॉ मधुमास है छाया
कमल जैसे हों झीलों में कि‍ जैसे दीप नावों में
तुम्‍हारा नाम होंठो पर सुबह से शाम तक आया ।

 

 

7

तुम्‍हारी जिंन्‍दगी में हों सजें उत्‍सव उमंगों के

सदा आनन्‍द की बरसात का मौसम रहे छाया
तुम्‍हें उपहार में दि‍ल दें कि‍ दे दें उम्र ही अपनी
कहीं तुम यह नहीं कह दो कि‍ हमसे कुछ नहीं पाया ।

 

 

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