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डाँ शोभा श्रीवास्तव

 

 

सर उठाऊँ अगर तो मुझसे कतराते हैं लोग।
झुका दूं सर तो फिर नजरों से गिराते हैं लोग॥
बहुत मुश्किल है साथ चल पाना दुनिया के,
दिल में कुछ अौर है, जुबां पे कुछ लाते हैं लोग।।
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ग़म की अौकात ही क्या है जो सताए मुझको।
मेरा उम्मीदों से रिश्ता बहुत. पुराना है।
चौकसी कर रही हैं लहरें मेरी कश्ती की,
मुझे इस रेत की दरिया के पार जाना है।
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गिरे हुए को तुम इक बार उठाकर देखो,
भटके हुए को सही राह पर लाकर देखो।
मंदिरों की चौखट को बहुत रोशन किया तुमने,
अँधेरी बस्ती में इक दीप जलाकर देखो॥
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नूर सूरज का संग होगा सांझ ढलने तक,
करोगे क्या मगर तुम चाँद के निकलने तक।
रोशनी कैद है तुम्हारी बंद मुट्ठी मे,
अँधेरा है अगर तो सिर्फ दीया जलने तक।
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:
नेह, मर्यादा के जब से हाथ पीले हो गये,
सभ्यता के पाँव के पाजेब ढीले हो गये।
हो गई है मौन अधरों पर सजी मुस्कान तक,
डगमगाती आस्था के नैन गीले हो गये॥

 

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