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मुरझते फ़ूल---डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

मुरझते फ़ूल

बरसों बीत गये लेकिन आज भी हिन्दुस्तान के एक समृद्धशाली शहर के स्टेशन पर की वह घटना भूल नहीं पाई हूँ । वो पौष महीने की ठिठुरती रात और स्टेशन पर रोता-विलखता आठ- नौ साल का बालक, जिसे अनेकों बिप्लवी घेरे खड़े थे । कोई कह रहा था--- ’मेरे साथ चलो, कुछ दिन मेरे पशुओं को चारा-पानी देना, मैं तुमको बदले में खाना भी दूँगा और कुछ पगार भी । जब घर जाने के पैसे तुम्हारे पास हो जायें, तब घर चले जाना” ; कोई कह रहा था---’मेरा बूढ़ा बाप बहुत बीमार रहा करता है, उसकी सेवा करना” । इस तरह वहाँ खड़े सभी उसे दरिद्र बच्चा समझकर, उस पर अपनी-अपनी कृपा बरसा रहे थे और बच्चा जार-बेजार रोये जा रहा था । उसका बचपन कुम्हला रहा था,ज्यों सहसा कड़ी धूप निकल आने पर बौछार की गीली मिट्टी रूखी हो जाती है , वैसे उसके मुँह पर धूल उड़ रहा था । सब मिलाकर एक अजीब और करुण दृश्य था । उस दुध-मुँहे बच्चे को जोर-जोर रोता-विलखता देखकर भी, किसी के आँखों में आँसू की बूँदें नहीं थीं बल्कि वहाँ खड़ा हर आदमी यही सोच रहा था कि “मैं अपना मनुष्य धर्म निभा रहा हूँ ’ और धर्म निभाना गौरव की बात है । यह सब होता देख दूर खड़ी मेरी सहिष्णुता , शेष सीमा पर पहुँच चुकी थी । मैं भीड़ को चीरती हुई, बच्चे के पास गई और बोली---’क्या बात है, बेटा, तू रो क्यों रहा है ? कौन है तू ? तुझे जाना कहाँ है ? वह काँपते स्वर में बताया ___’ अंटी ! मुझे पटना जाना है । मैं यादवपुर (कोलकाता ) से आ रहा हूँ । मेरे पिता, वहाँ कॉलेज में चपरासी हैं । ’ उसके बाद वह आगे कुछ न बोलकर , फ़फ़क-फ़फ़ककर रोने लगा और उसकी आँखों से बरस रहे आँसू की बूँदें ,मेरे पैरों पर लुढ़क जाने लगे । मैं आगे और कुछ पूछ पाती, उसके पहले ही आगे बढ़कर, एक आदमी बताना शुरू किया---’ मैडम ! यह लड़का, अभी-अभी जो गया-ट्रेन यहाँ से गुजरी है, उसी से उतरा है । इसका कहना है ----’इसके टिकिट और पैसे ,दोनों ही किसी ने चुरा लिये , इसलिए टी० टी० ने गाड़ी से इसे उतार दिया । लेकिन इसे देखकर तो मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता । निश्चय ही यह बिना टिकिट का स्लीपर क्लास से सफ़र कर रहा था । यहाँ इस कदर के बच्चे, आपको बहुत मिल जायेंगे । इस पर रहम करना, बेटिकिट—यात्रा को बढ़ावा देना होगा ।
उस अनजान आदमी की बात पर मुझे हँसी आ गई । मैं अपनी हँसी को रोकती हुई, तीव्र कंठ से बोली----’आप तो कहानी इस कदर धारावाहिक बता रहे हैं, लगता है, आप इसे पहले से जानते हैं !’ वह समझ गया, मैं क्या बोलना चाह रही हूँ । अपना सिक्का न जमता देख, वह वहाँ से खिसक गया । उसके बाद मैं बच्चे से पूछी ---बेटा ! तू रोओ मत । मैं तुझे घर जाने का टिकिट अभी कटा देती हूँ, लेकिन पहले ये बता---’तूने कुछ खाया है ?’ उत्तर में सिर हिलाकर, बोला--- ’नहीं’ । उसका उत्तर एक ज्वाला की भांति मेरे दिल को जला दिया ; मेरे आँसू आ गये । मैं झटपट अपने बैग से कुछ रोटियाँ निकालकर बोली----मैं तेरा टिकिट ,इसी शर्त पर कटवाऊँगी, जब तू इन रोटियों को खा लेगा ।’
बच्चे ने एक चील की तरह, झपट्टे मारकर मेरे हाथ से रोटियाँ ले ली और खाने लगा । उसे खाता देख, मैं खुद पर काबू नहीं रख पाई, मेरी आँखों में ठहरे आँसू बाहर निकल गये । मैं जो रवैया,लोगों का उसके साथ देखी, मुझे लगा कि आजकल लोग खुद को इतने गिरा चुके हैं,कि अब न तो उनमें देवत्व बचा , न ही मनुष्यत्व । अगर कुछ बचा है तो वह है मदांधता और हृदयहीन निर्लज्जता । यहाँ एक ऐसा इन्सान नहीं मिला , जिसने बच्चे की आत्मा का कत्ल नहीं किया ।
बच्चे ने खाना खत्म होते ही, अपनी रोनी सूरत लिये हसरत भरी निगाह से मेरी ओर देखते हुए कहा ---- अंटी ! मैंने खाना खा लिया; मुझे टिकिट दोगी न ?
मैं ,उसके आँसू पोछती हुई बोली ---’ अवश्य , अभी देती हूँ’ ।
वह मेरे साथ जाने के लिए ,जल्दी-जल्दी उठ खड़ा हो गया और मेरी ओर चकित नेत्रों से ताकने लगा, मानो उसे अपने कानों पर विश्वास न हो रहा हो । मैं अपना सामान संभाली और उसके साथ टिकिट काउंटर पर पहुँची । जब मैं टिकिट लेने लगी, तब वह बालक काँपते स्वर में फ़िर बोला--- अंटी ! पटना का ।
मैं स्नेहभरी आँखों से उसकी ओर देखकर बोली ---- हाँ, बेटा, पटना का ।
कुछ ही देर में मुझे पटना का टिकिट मिल गया । मैं टिकिट , बच्चे की ओर बढ़ाती हुई बोली---- ये रहा तुम्हारा पटना का टिकिट, अब तुम प्लाटफ़ार्म में जाकर खड़े हो जाओ । ट्रेन आती ही होगी, तभी एनाउंसमेन्ट हुआ, पटना की ट्रेन 1 नं० प्लाटफ़ार्म पर आ रही है ।
मैं बोली----- चलो, अच्छा हुआ, पहले तुम्हारी ट्रेन आ रही है, तुझको ट्रेन में चढ़ाकर, तेरी सीट पर बैठा दूँगी ताकि तुम, निर्विघ्न घर पहुँच सको ।
थोड़ी ही देर में दादर की ट्रेन आकर रूकी, जो पटना होकर मुम्बई जाती है । मैं बच्चे को उसकी सीट पर ले जाकर बिठा दी और बोली--- इस बार सोना मत । मेरी बातों को सुनकर वह रोने लगा और फ़िर एक बार उसकी आँखों से बह रहे अश्रू बूँद लुढ़ककर मेरे पैरों पर गिरने लगे । मैं उससे बिना कुछ बोले, ट्रेन से उतर गई और अपनी गाड़ी के लिए इंतजार करने लगी ।

 

 

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