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सामाजिक जीवन का महत्व----प्रो. राजश्री मोकाशी

 

 

मनुष्य अपनी मूल प्रकृति और आवश्यकताओं के कारण एक सामाजिक प्राणी कहलता है। आरंभ में मनुष्य ने प्राकृतिक संकटों से अपन बचाव करने हेतु सामाहिक जीवन की उपयोगिता और आवश्यकता को समझकर सबसे पहले उसने अपनी पत्नी और बच्चों का समूह बनाकर एक कुटुंब का संघटन बनाया, किंतु एक छोटा सा कुटुंब बडे-बडे प्राकृतिक संकटों से अपनी सुरक्षा करने में सक्षम न होने से मनुष्य समाज के संघटन-कार्य में संलग्न हुआ, जिससे एक संस्कृति का जन्म हुआ। समाज की आशा, आकांक्षा, आस्था-विश्वास, आमोद-प्रमोद, पर्व-उत्सव आदि की प्रमुख प्रवृत्तियों को साहित्य अपने बाहुपाश में समाविष्ट कर लेता है। सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक मान्यताओं का चित्रण जायसी ने अपनी रचनाओं में किया है। वे एक महान् समाज शास्त्री थे।
महाकवि मलिक महमद जायसी द्वारा लिखित ‘पद्मावत’ प्रेमाश्रयी शाखा का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ रहा है। इसमें उन्होंने सन्यस अथवा वानप्रस्थ जीवन को महत्व न देकर सामाजिक जीवन को स्थान दिया है। वैसे भी इस्लाम की मान्यता है कि “मनुष्य को समाज में रहकर सामाजिक समस्याओं में उलझ कर उसे मुक्ति पाना ही जीवन की सार्थकता है।”1 जहाँ महाकवि जायसी ने इस्लाम जीवन दर्शन से संबंधी कथाओं का उल्लेख किया है वहीं उन्होंने हिंदु पारिवारिक जीवन का चित्रण लगभग सभी काव्यों में किया है। जायसे एक मुस्लिम होकर भी उनके द्वारा ‘पद्मावत’ में किया गया तत्कालीन हिंदु समाज का चित्रण सुंदर बन पड़ा है। ‘जायसी हिंदु रंग में रंगे हुए फकीर थे।’2 उन्होंने हिंदु जीवन को अत्यंत निकट से देखा था। 15-16वीं शताब्दी के भारतीय समाज सुंदर, अविकल, जीवन और प्रभविष्णु प्रतिकृति जैसे ‘पद्मावत’ में मिलती है वैसी शायद ही कहीं मिले। तकालीन समाज का जीवंत चित्र ‘पद्मावत’ में विद्यमान है। सामाजिक कृत्यों का, समाज में प्रचलित प्रथाओं का, प्रमुख रूप से विवाह, गौना, जौहर, वर्ण-व्यवस्था, परिवार आदि का सुंदर वर्णन मिलता है।
समाज की प्रथम इकाई व्यक्ति होता है। फिर परिवार, उससे बना समुदाय और फिर समाज का स्थान आता है। महाकवि जायसी ने ‘पद्मावत’ में हिंदु परिवार का चित्रण करते हुए माता-पिता, पुत्र, पुत्री, पुत्र-वधु आदि को परिवार के अभिन्न अंग के रूप में चित्रित किया है। हिंदुओं में पुत्र का महत्व केवल वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए ही नहीं माना गया है, बल्कि मोक्ष प्रदान करनेवाला भी समझा गया है। किंतु पुत्र हो या पुत्री माता-पिता को अपनी संतान के प्रति स्वाभाविक प्रेम होता ही है। ‘पद्मावत’ में जब नायक रत्नसेन योगी बनकर घर से निकलने लगता है तो उसके कुटुंब के लोग अत्यंत दु:खी होते हैं। रत्नसेन की माता और पत्नी नागमती विलाप करती हैं। जिससे उसके परिवार में कोहरम मच जाता है।
“रोवे माना न बहुरै बारा।
रतन चला जग का अँधियारा।।
बार मोर रजियाउर रता।
सो लै चला सुवा परबता।।
रोवहि रानी तजहि पराना।
फोरहि बलय करहि खरियाना।।
चूरहि गिव अभरन ओ हारू।
अब काकहं करब सिंगारू।।”
‘पद्मावत’ में जायसी ने पारिवारिक जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया है।
परिवार के बाद भारत में सामाजिक जीवन की दुसरी कडई जाति है और इसके मूल में प्राचीन वर्ण-व्यवस्था है। जायसी सामाजिक व्यवस्था से अवगत थे अत: उन्होंने ‘पद्मावत’ में विभिन्न जातियों का यथास्थान उल्लेख किया है। मध्ययुग में समाज ब्राह्मण, क्षत्रीय वैश्य और अन्य वर्णों में बँटा हुआ था और ब्रह्मणों की श्रेष्ठता तत्कालीन समाज में भी पायी जाती है। वेद शास्त्र के अनुसार कार्य करनेवाले ब्राह्मण को ही पंडित की संज्ञा दी जाती थी। जायसी ने समाज में वेदशाश्त्र पंडितों की मान-प्रतिष्ठा को लक्ष्य करके ही स्थान-स्थान पर ब्राह्मणों की प्रशंसा की है-
“पंडित होई सो हाट न चढ़ा।
चहौ बिकाइ भूलिगा पढ़ा।”
हीरामन सुझा स्वयं को वेद शास्त्रों में पारंगत और विद्वान बताता है। जायसी ने राघव-चेतन जैसे कुटिल ब्राह्मणों की निंदा करने से भी नहीं चूके हैं। वर्ण-व्यवस्था के अनुसार क्षत्रीय का स्थान दूसरा होता है। जायसी ने क्षत्रियों का उल्लेख वीरता, गौरव, मर्यादा, स्वामिभक्ति आदि के प्रसंग में करते हुए राजपूतों के छत्तीस कुलों की चर्चा की है। पद्मावती गोरा-बादल को रत्नसेन की मुक्ति के लिए बेडा देते हुए उनकी तुलना अंगद, हनुमान, अर्जुन-भीम, नल-नील, कर्ण आदि क्षत्रियों से करके उनके भीतर जातीय गौरव की भावना को जागृत करती है। वैश्य जाति का उल्लेख भी ‘पद्मावत’ में यत्र-तत्र मिल जाता है। जन-जातियों में धोबी, माली, तेली, डोम, भंगी, रंगरेज, लुहार आदि का उल्लेख किया है। वर्ण-व्यवस्था में ये जातियाँ शूद्र मानी जाती हैं।
मध्यकालीन भारतीय समाज में नारी दशा दयनीय थी इसका चित्रण भी जायसी ने ‘पद्मावत’ में किया है। पुरूष का स्थान स्त्री से ऊँचा माना जाता था। पुरूषों को कुल दीपक माना जाता था। इसके विपरीत नारी की दशा थी। पिता के घर में उसे खेल-कूद की स्वतंत्रता थी, किंतु पति के घर में उसे सास-ननद और ससुर के प्रकोप सहने पड़ते थे। समाज में पर्दाप्रथा का चलन था। पद्मावती अपने पिता के घर में भी पर्दा करती थी और जब अल्लाउद्दीन के महल में जाने का ढोंग करती है तब भी वह पालकी में पर्दे के साथ आने का प्रस्ताव रखती है। बादल की पत्नी भी घूँघट निकालती थी।-
“मानि गवन जस घूँघट काढी।
बिनवै आइ नारी भै ठाढी।।
तीखे हेरि चीर गहि ओढा।
कंत न हेर कीन्ह जिय पोढ़ा।।”
हिंदु समाज में विशेष कर राजपुतों में सती तथा जौहर की प्रथाओं का प्रचलन था। भारतीय नारी पति की कृपादृष्टि मात्र पाने के लिए व्याकुल रहती है। नारी जीवन में पति निष्ठा का प्राबल्य था। पति उसके जीवन के केंद्र बिंदु हुआ करते थे। मध्ययुगीन राजपूतनियाँ युद्धकाल में दुर्ग के भीतर एक विशाल चिता की ज्वाला हर क्षण प्रस्तुत रखती थी। जब राजपुतों की सामुहिक पराजय के समाचार क्षत्राणियों तक पहुँचते थे, तब वे धधकती आग में कूद पड़ती थी और भस्म हो जाती थी। श्री.ए.जी.शिरेफने लिखा है कि “जौहर सामूहिक आत्म-बलिदान है जिसकी बलिदेवी वीर क्षत्रियों के लिए रणभूमि होती थी, जहाँ वे मृत्युपर्यंत लड़कर प्राण दे देते थे और क्षत्राणियाँ अग्नि की ज्वाला में कूदकर प्राणांत कर देती थी।”3 इस प्रथा का उल्लेख जायसी ने ‘पद्मावत’ में अनेक स्थलों पर किया है। जब देवपाल से युद्ध करते हुए रत्नसेन मारा जाता है तो पति के स्वर्गारोहन का समाचार पाकर नागमती और पद्मावती ने जौहर की ज्वाला में प्राणाहुति दी। रत्नसेन की मृत्यु के पश्चात् अल्लाउद्धिन ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तो इस संक्रमण काल में अनेक स्त्रियाँ जौहर की ज्वाला में कूद पडी।

“जौहर भइँ सब इस्तरी,
पुरूष भये संग्राम।
बादशाह गढ चूरा।
चितउर भा इसलाम।।”
विवाह जैसी सामाजिक प्रथा का उल्लेख करते हुए हिंदु समाज के लोकदृष्ठ विवाह वर्णन के आधार पर पद्मावती-रत्नसेन के विवाह की कल्पना की है। पद्मावत में वर्णित मंडप, ग्रंथिबंधन, पंडितों का वेदपाठ, सप्तपदी, राशीनाम आदि से यह बात अधिक स्पष्ट हो जाती है। रत्नसेन- पद्मावती के लग्न निर्धारण का कार्य होते ही सबको निमंत्रण भेजे गये। मुक्ता-माणिक्यों के संघटन द्वारा मंडप का सजाव किया गया। नगर मंगल-गीतों से गूँज उठा। मंगल वाद्य झंकृत हो उठे। शुभ मुहुर्त में अश्वपर आरोहित रत्नसेन राजसी वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर बारात के साथ आता है। इसके पश्चात् हिंदु विवाह शास्त्र के अनुरूप रत्नसेन और पद्मावती का विवाह होता है। ग्रंथिबंधन, मंत्रोच्चार, सप्तपदी आदि प्रथाओं के वर्णन से उस समय में प्रचलित सामाजिक, सांस्कृतिक तथा विशिष्ट लौकिक रीति-रस्मों, कृत्यों और परंपराओं पर प्रकाश पडता है। जैसे की हिंदु विवाह में जब तक वर-वधु सप्तपदे कृंत्य पुरा नहीं करते तब तक ‘पाणिग्रहण संस्कार’ पूर्ण नहीं समझा जाता।4 सप्तपदी को लेकर कवि कहते हैं-
“चाँद सूरज सत भाँवर लेहीं।
नखत मोति नेवछावरि देहीं।”
वरयात्रा के समय अटारियों पर दूल्हा देखने के उत्कंठा से भरी स्त्रियों का जमावडा भारत वर्ष का एक बहुत पुराना दृश्य। जायसी ने अपनी पेनी दृष्टि से एेसे दृश्यों को ओझल होने नहीं दिया। ‘पद्मावत’ की कथा के ‘रत्नसेन-पद्मावती विवाह खंड’ और ‘रत्नसेन-पद्मावती भेंट खंड’ विवाह जैसी सामाजिक परंपरा पर आधारित हैं।
महाकवि जायसी ने मध्यकालीन समाज में प्रचलित जिन पर्वोत्सवों और त्योहारों का वर्णन किया है वे हिंदु समज के हैं। प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में विभिन्न पर्वों और त्योहारों से इतना संकुल है कि यहाँ प्रत्येक दिन कोई-न-कोई पर्व रहता है। पर्वोत्सव और त्योहार मानव को केवल मानसिक रूप से ही उत्कृष्ट तथा उल्लसित नही बनाति, बल्कि उसके शरीर को भी नवीन, स्फूर्ति एवं कांति प्रदान करते हैं। पद्मावत में पर्वोत्सवों में वसंत पूजन, सप्तार्षि पूजन एवं त्योहारों में होली, दीवाली और दशहरे का अत्यंत रसमय वर्णन किया है। वसंत वर्णन का श्री पंचमी और वसंत ऋतु एेसे दो रूपों में वर्णन किया गया है। श्री पंचमी के पर्व का उल्लेख हीरामन सुझा ने रत्नसेन को पद्मावती के मिलन की युक्ति बताते समय किया है। “माघमास के द्वितीय पक्ष में श्री पंचमी को महादेवजी का मंदिर खुलता है। उस पर्व में पूजा के लिए सरा संसार जाता है। पद्मावती भी पूज करने आयेगी। इस प्रकार आपका (रत्नसेन का) और पद्मावती का मिलन होगा। जब वह वसंत पूजा के लिए आएगी, तब आपकी मनोकामना पूरी होगी।”5 पद्मावती और उसकी सखियाँ वसंतागमन पर बारह आभरण और सोलह श्रॄंगार से सुसज्जित होकर वीणा-मृदंग के साज-बाज सहित अनंदोत्सव मनाती हैं। इस अवसर पर लोग मनोरा, झूमक, धमरी आदि लोक गान तथा चाँचरी आदि लोक-नृत्यों का आयोजन करते हैं। ढोल, दुँदुभि, तूर्य, पटह, मादर आदि अनेक प्रकार के वाद्य झंकृत हो उठते हैं। स्त्रियाँ श्रॄंगार कर शिव पूजा के लिए जाती हैं। ‘वसंत खंड’ में इस दृश्य का जायसी ने सुललित भाषा में काव्यात्मक वर्णन किया है-
“नवल वसंत नवल सब बारी।
सेंदुर बुक्कन होइ धमारी खिनहिं खिनहिं खिन चाँचरि होई।
नाच कूद भूला सब कोई सेंदुर खोह उडा अस। गगन भएउ सब रात।
रती सगरिदुँ धरती। राते बिरिछन्ह पात।”6
वसंतोत्सव के अवसर पर ही जायसी ने होली जलाने की चर्चा की है। इस अवसर पर भी तत्कालीन समाज में होनेवाली चाँचरी नृत्य तथा धमारीगान, मनौरा, झूमक आदि लोक-गीतों का भी वर्णन किया है। होली के अवसर पर अबीर गुलाल उडाए जाने का उल्लेख ‘गोरा-बादल युद्ध खंड’ में उपमान रूप में किया गया है।- ‘खेलि फाग सेंदुर छिरकावा।’
‘नागमती वियोग खंड’ में ही कवि ने नागमती का शोभारहित र्दपावली का चित्रांकन करते हुए कहा है- जब कार्तिक के कृष्ण पक्ष में दीपावली का पर्व आया तो वह पतिविमुक्ता विरह दुख से पीडित थी, लेकिन संसार भर में उल्लास ही उल्लास था। उसकी सखियाँ दीआली की क्रिडाएँ करते हुए झँग मोह-मोडकर झूमक गा रही थी-
“चहु खंड लागै अंधियारा।
जो घर नाहिन कंत पियारा।।
अबहु निठुर आव एहि बार।
परब देवारी होइ झंडारा।
सखि झूमक गावहिं अंग मोरी।
हओं झुरौं बिछुर्रा जेहि जोरी।”7
इसके अतिरिक्त जायसी ने मध्ययुगीन भारतीय समाज में प्रचलित गौणा प्रथा, खान-पान में बावन प्रकार का भोजन, उनके वस्ताभूषण, रस्म-रिवाज, गायन-वादन, क्रिडा-विनोद आदि की चर्चा ‘पद्मावत’ में की है। इससे हमें तत्कालीन हिंदु परंपरा का परिचय मिलता है। इस तरह जायसी द्वारा ‘पद्मावत’ में किया गया मध्ययुगीन भारतीय समाज का चित्रण अद्वितीय बन पडा है।
संदर्भ-
1. डा.इकबाल अहमद ट्ट महाकवि जायसी और उनका काव्य : एक अनुशीलन ट्ट पृ - 225
2. प्रो.शिवसहाय पाठक ट्ट पद्मावत का काव्य सौंदर्य ट्ट पृ - 191
3. श्री.ए.जी.शिरेफ ट्ट मदुमावती ट्ट पृ - 293 (पाद टिप्पणी)
4. “दी मेजारिटी व्यू इज दैट दी पार्टीज बिकम वाइफ एेंड हसबेंड इट दी एंड ऑफ सप्तपदे।” ट्ट डा.ए.एस.अल्तेकर ट्ट दे पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिंदु सिविलिजेशन ट्ट पृ - 97

5. जायसी ग्रंथावली ट्ट नागरी प्रचारिनी सभा, काशी ट्ट पृ - 69
6. जायसी ग्रंथावली ट्ट नागरी प्रचारिनी सभा, काशी ट्ट पृ - 82
7. जायसी ग्रंथावली ट्ट नागरी प्रचारिनी सभा, काशी ट्ट पृ - 153

 

 

 

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