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‘‘दरारें’’----रविकान्त मिश्रा

 

दुकान पर रह - रह का मौहल्ले के आवारा लड़के आ जाते । केसरी बाबु को धमकाते हुए बोलते, केसरी बाबा, जब बंटवारा हो ही गया था तो आप पाकिस्तान में क्या करने के लिए रह गए ? अब भी समय है निकल जाओ नही ंतो समझ ही सकते हो, तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के साथ क्या हो सकता है? तभी हामिद तीखे स्वर में बोला केसरी पंडित पाकिस्तान से इतना ही प्यार है तो फिर पाकिस्तानी बन कर रहो न, इस्लाम काबूल कर लो और पाकिस्तान के वफादार बन जाओ। यह हमसे सहन नहीं होता कि पाकिस्तान की जमीन पर हिन्दुस्तान का पंडित पूजा पाठ करे, क्यों अहमद ! अहमद जो सबसे मोटा लड़का था इनके ग्रुप का वह बड़े प्यार से केसरी को प्रणाम करता हुआ बोला - केसरी पंडित जी यह पूजापाठ की दुकान बंद कर दीजिए और कसाई की दुकान खोल लें। गौ मांस अगर खा नहीं सकते तो बेच तो सकते ही हैं। अहमद के जोकरी आन्दाज पर सब ठहाका मार कर हँसने लगे। हंसते - हंसते अहमद ने केसरी पंडित के दुकान से किसमिस का डिब्बा खोल एक मुठी किसमिस निकाल लिया और अपने गोल गप्पे जैसे मुँह में भर कर उसे भैंस की तरह चबाने लगा। पंडित केसरी बाबु पत्थर की बुत की तरह चुपचाप दुकान में बैठे यह सब कुछ सुनते सहते रहे। उनके आस पास के दुकान वालों के लिए ये रोजमर्रे की बातें थीं। हिन्दु या मुस्लिम कोई भी इन आवारा लड़कों के मुँह नहीं लगता था। पंडित जी के भीतर मन में गुस्सा, दुःख, अफसोस और शर्मिन्दगी सब कुछ चक्रवात की तरह आत्मा को झकझोर रहा था। जी चाह रहा था कि इन लड़कों को स्कूल की बेंत से जाम कर पिटाई करें और कान पकड़ कर इनके माता - पिता के सामने ले जायें और उनसे यह सवाल पूछें कि क्या पाकिस्तान में हिन्दु रहेंगे या नहीं रहेंगे इसका फैसला यह आवारा लड़के करेंगे ? परंतु केसरी जी ऐसा नहीं कर सकते थे। क्योंकि लड़कों के सामने इनके माता - पिता भी उतने ही वेवस थे, जितने केसरी जी। तब प्रश्न उठता है कि इन मासुम के दिमाग में ज़हर की खेती कौन कर रहा है ? वो कौन लोग हैं जो पाकिस्तान से हिन्दुओं का नामों निशान मिटा देना चाहते हैं। क्या वे लोग धार्मिक हैं या सियासी हैं ? या धार्मिक होकर सियासी हैं। जब बंटवारा हुआ था तब जो तय हुआ था अगर वो पाकिस्तान में टूट रहा है तो फिर क्या वजह है कि हिन्दुस्तान में वो पनप रहा है। काश बंटवारे के समय हम भी हिन्दुस्तान चले जाते तो आज यह जिल्लत की जिन्दगी रोज - रोज जीनी नहीं पड़ती। चैबीस घंटे भय के साये में जी रहा हूँ, घर से निकलता हूँ दुकान के लिए तो मन यह सोच कर भय से सूखे पत्ते की तरह कांपने लगता है कि सीता बेटी घर में अपनी माँ के साथ अकेली है, कहीं ये आवारा जहरीले नस्ल हमारी बेटी को न डस ले। पत्नी यशोधरा मेरे घर से बाहर कदम रखते ही ऐसे मायुस हो जाती है, जैसे वह मुझे जीवन में अन्तिम बार देख रही हो। पता नहीं आज रात दुकान से वापस घर लौटूँगा या नहीं। मैं भी मन नही मन भगवान से प्रार्थना करता रहता हूँ कि हे राम घर वापस जब भी लौटूँ तो सीता और यशोधरा उसी तरह मेरी राह देखती हुए मिले जैसे पहले वह राह देखती थी। जब तक घर नहीं पहूँचता, तब तक दिन में चार - पांच बार फोन कर झूठ मुठ के बहाने बना कर कभी पत्नी से, कभी बेटी से बातें करता रहता। यही हाल सीता और यशोधरा के तरफ से भी है, अगर मैं ग्राहक को सौदा देने में व्यास्त हो जाता तो सीता बेटी या यशोधरा फोन कर लेती। सारा परिवार भय के साये में रोज जागता और सोता है। सीता बेटी का लगभग घर से निकलना बंद हो गया था, अगर सीता घर से बाहर काॅलेज के लिए सप्ताह दस दिनों में जाती तो बुर्का पहन कर ताकि मौहल्ले के आवारा शहजादों की नजर उन पर न पड़े, नहीं तो ये आवारा शहजादे किसी भी हिन्दु खुबसूरत लड़की को तभी छोड़ते जब तब उससे निकाह कर उसका धर्म परिवर्तन नहीं करवा लेते। पिछले दिनों की बात है सिन्धी परिवार की खूबसूरत बेटी सरस्वती मलकानी का बुर्का काॅलेज के काॅमन रूम से कोई गलती से या जान बुझ कर उठा कर ले गया। बेचारी सरस्वती मलकानी को बिना बुर्के के काॅलेज से बाहर निकलना पड़ा, सड़क पर चलते हुए शर्म से सिर झुकी हुई थी और भय से उसका मन कांप रहा था। परन्तु वह धीरे - धीरे चले जा रही थी। तभी आवारा शहजादों की नज़र इस मासुम पर पड़ गई फिर क्या सभी ने सरस्वती का पीछा उसके घर तक किया। घर पहुँच कर सरस्वती तो घर के भीतर चली गई, परन्तु इन आवारा शहजादों को अपने घर का पता बता गई। और साथ - साथ यह भी इन आवारों ने पता कर लिया कि लड़की सिन्धी परिवार की है, बस इन लोगों ने अभियान छेड़ दी। लड़की कितने बजे घर से निकलती है, कितने बजे सोती है, कौन से काॅलेज में पढ़ती है, उसकी कौन - कौन सी सहलियाँ हैं, सारी जानकारी के बाद एक दिन सरस्वती का अपहरण कर लिया गया। सरस्वती घर से काॅलेज के लिए निकली कि कई महीनों तक वापस नहीं आयी। बाबुनाथ मलकानी कपड़े के व्यापारी बेचारे दौड़ - दौड़ कर पुलिस थाने जाते, रिपोर्ट लिखवाते, पुलिस के सामने भिखारी की तरह गिड़गिड़ाते, बेटी के बारे में पूछताछ करते, इस पर पुलिस वालों की एक ही जवाब होता अरे मलकानी जी आप बेकार की चिन्ता करते हैं। जवान लड़की है भाग गई होगी अपने किसी यार के साथ। आप धीरज रखें वापस आ जायेगी। आप बिलकुल चिन्ता न करें पाकिस्तान में लोग औरतों की बहुत इज्जत करते हैं। आपकी बेटी जहाँ भी होगी इज्जत से होगी। बहुत जल्द आपको उसकी सलामती की खबर मिल जायेगी। बाबुनाथ जी मेरी सलाह मानें तो आप अपने धंधे पर ध्यान दें। अगर बार - बार पुलिस थाने आयेंगे तो लड़की हाथ से पहले ही जा चुकी है अब अगर धंधा भी हाथ से चला गया तो फिर आप क्या करेंगे। बेचारे बाबूनाथ मलकानी जिल्लत और गुस्से से मन ही मन चीखते हुए पुलिस थाने से बाहर निकले। और अपने आप से बोलने लगे, सब जानता हूँ मैं ये सब क्यों हम जैसे लोगों के साथ हो रहा है। तुम सभी इस साजिस में शामिल हो। मेरी बेटी सरस्वती भागी नहीं है, उसका अपहरण हुआ है। तुम सभी जानते हो कि मेरी बेटी कहाँ है, परंतु तुम मुझे नहीं बताओगे क्योंकि मेरे नाम के पीछे मलकानी लगा हुआ है। अगर मेरे नाम के पीछे खान अंसारी या मल्लिक लगा होता तो अब तक मेरी बेटी बइज्जत घर पहुँच चुकी होती। तीन मास बाद एक दिन सरस्वती का फोन घर पर आया, सरस्वती ने रोते - रोते बताया कि उसने इस्लाम काबूल कर लिया है और उसका निकाह शमीम अंसारी से हो गया है। इतना बोलकर सरस्वती ने फोन काट दी। बाबूनाथ और उसकी पत्नी मीरा पत्थर की मुर्ति की तरह सोफे पर आमने - सामने बैठे रह गए। जैसे उनके पैर के नीचे से जमीन किसी ने खींच ली हो और इस वक्त हवा में पिंड की तरह घूम रहे हैं। कुछ पलों बाद दोनों पति - पत्नी बुकार पार कर रोने लगे जैसे उसकी बेटी की किसी ने हत्या कर दी हो। इसके साथ - साथ उनके वजूद और आत्म सम्मान को जला कर राख कर दिया।
काश ! ये दिन देखने के लिए हमलोग पाकिस्तान में न रहे होते। केसरी पंडित ने गहरी सांस छोड़ते हुए अपने आप से कहा। तभी उनकी आत्मा ने उनकी भीतर सरगोशी की चलो यहाँ से हिन्दुस्तान, जहाँ भिख मांगेंगे पर जिन्दा एक हिन्दु की तरह रहेंगे और मरेंगे भी तो एक हिन्दु की तरह मरेंगे। पता नहीं यहाँ पाकिस्तान में मैं कब तक अपने रामायण और गीता को बचा कर रख पाऊँगा। फिर जिस देश में धर्म, अर्थ और बेटी की रक्षा का कोई उपाय न हो उसे छोड़ देना ही उचित है। यह संकल्प के साथ केसरी पंडित मुल्ला उमरउद्दीन के पास गए और अपने दुकान का बेचने की बात की। दुकान की चाभी मुल्ला उमरउद्दीन की दरी पर रखते हुए केसरी पंडित हाथ जोड़ कर मुल्ला जी से बोले - मुल्ला हम दोनों बचपन के दोस्त हैं, आज तुझे अपनी दोस्ती का वास्ता मेरी दुकान तु खरीद ले जो रकम भी तु देना चाहे दे दे पर अब तेरा यह दोस्त पाकिस्तान में नहीं रह सकता। इस बात पर मुल्ला की आंखें छलक आई वह कभी दुकान की चाभी को कभी केसरी के चेहरे को देखते हुए भींगे स्वर में बोले केसरी क्या वक्त अल्लाह ने आज दिखाया है। आज एक दोस्त अपनी सर जमीन इसलिए छोड़ना चाहता है कि उसका दोस्त उसकी अस्मत की रक्षा नहीं कर सकता। आज नमाज में खुदा से यह सवाल करूँगा कि यह कैसा समय आ गया, जब एक दोस्त एक भाई अपने देश में एक साथ नहीं रह सकता सिर्फ इसलिए कि उसका धर्म अलग है। भाई केसरी बोल कितना रकम चाहिए तु जितना बोलेगा मैं उतना रकम दे दूँगा और यह दुकान तेरी ही रहेगी तु जब भी पाकिस्तान वापस आयेगा तेरा यह दुकान तेरी लिए हाजिर होगा। यह सुन केसरी बोला भाई मुल्ला जो बाजार का भाव है वही मुझे दे दें। मुल्ला यह सुनकर कुछ नहीं बोला अपने लकड़ी के बक्से से चेक बुक निकल कर उस पर साईन कर दिया और बोला भाई केसरी रकम तु भर लेना पाकिस्तान से जा रहे हो इतना विश्वास तो अपने साथ ले जाओ कि यहाँ भी सच्चे इन्सान सच्चे मुसलमान रहते हैं। केसरी ने मुल्ला से कलम लेकर चेक पर तीन लाख रूपये भर दिये और चेक मुल्ला को दिखाते हुए बोला दोस्त तीन लाख भरे हैं ठीक है न .... मुल्ला की आँखों में एक भी फिर पानी तैरने लगा भीगे गले से मुल्ला पंडित से बोला आखिर तु पोंगा पंडित का पोंगा पंडित ही रह गया, तेरी जगह कोई दूसरा होता तो इस रकम से दुगुनी रकम भरता। पर तुने ईमान की रकम भर कर एक बार फिर अपनी दोस्ती को सलाम किया। दोस्त आज यह मुल्ला तुम्हारे पैर छुता है। इतना बोल मुल्ला उमरउद्दीन केसरी के पैर छुने झुके पर केसरी ने मुल्ला उमरदउद्दीन को गले से लगा लिया। गले से लगाते वक्त केसरी के मन में यह सवाल उठा जिस तरह मैंने उमरउद्दीन को गले से लगा लिया है, उसी तरह पूरा पाकिस्तान मुझे गले से लगा लेता तो जो दरार पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के मन को चीर कर दो भागों में अलग करता है, वह दरारें सदा के लिए बंद हो जाती। फिर किसी हिन्दु या सिन्धी को पाकिस्तान छोड़कर हिन्दुस्तान जाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। परंतु सच हमेशा हमारी भावना और विचार के अनुकूल नहीं होता। हर देश का सच वहाँ की अवाम तय करती है संविधान चाहे कुछ और कहता हो पर अवाम का संविधान उस देश का वर्तमान होता है। पंडित केसरी का वर्तमान पाकिस्तान में समाप्त हो रहा था और हिन्दुस्तान में शुरू होने वाला था। उस शाम भारी मन से केसरी जी घर पर लौटे, चुपचाप खाना खाया, रात सोते वक्त बोले कल से समान बांधना शुरू कर दो, हमलोग हिन्दुस्तान जा रहे हैं। पत्नी यह सुनकर कोई प्रतिक्रिया नहीं की बस सिर हिला कर सहमती भर दी ..... जैसे वह पहले से ही हिन्दुस्तान जाने की बात पर राजी बैठी थी। बेटी सीता ने भी यह बातें सुनी तो उसके भीतर से आवाज आई चलो हिन्दुस्तान में एक हिन्दु लड़की को बुर्का तो नहीं पहनना होगा। जबरदस्ती का एक काला लिबादा जो मेरे मन को एक अंधेरी गुफा में बदल दिया है, जिसमें मेरी भावना - संवेदना और सपने कैद होकर रह गए हैं। दूसरी सुबह केसरी पंडित पासपोर्ट और बीजा के दफ्तर गए तो वहाँ पता चला कि पासपोर्ट और बीजा बनने में तीन महीने लगेंगे। यह सुन केसरी बाबु का मन थोड़ा निराश हो गया, परंतु वह हिम्मत नहीं हारे। रोज दफ्तर के चक्कर लगाने लगे। किसी तरह खिला - पिला कर केसरी पंडित ने पासपोर्ट और बीजा एक महीने में हासिल कर लिया। उस दिन खुशी - खुशी पासपोर्ट और बीजा लेकर शाम को घर लौटे तो घर का जो दरवाजा उनके दस्तक और नाम पुकारने पर खुलता था वह आज पहले से ही खुला हुआ था। यह देख केसरी पंडित का मन शंका के भवंर में डुबने लगा। वह तुरंत घर के भीतर तेजी से आये तो देखे पत्नी यशोधरा खिड़की के पास पलंग पर चुपचाप बैठी खिड़की से बाहर शुन्य में देख रही थी। केसरी पंडित के घर पर आने की सूचना मात्र से जो नारी पंडित जी के आगे - पीछे सेवा में लग जाती थी, आज वही यशोधरा पत्थर की बुत बने पलंग पर बैठी थी। यह देख केसरी पंडित बेचैनी से पूछे - यशोधरा सीता बेटीया कहाँ है ? पंडित जी का प्रश्न सुन कर पत्थर की बुत में हलचल हुई बिना कुछ बोले यशोधरा ने अपना मोबाईल फोन पंडित जी की तरफ बढ़ा दिया। पंडित जी मोबाईल लेकर देखे तो उसमें मैसेज था। लिखा हुआ था पापा माँ मेरा अपहरण काॅलेज के गेट से हो गया है। मैं कहाँ हूँ मुझे नहीं मालुम पर जिन्दा हूँ यह मोबाईल अब मुझ से छीन लिया जायेगा, आपकी बेटी सीता का अपहरण दस रावणों ने मिलकर किया है। पापा क्या भगवान राम के दुत हनुमान मेरी खैर खबर पूछने आयेंगे ? या मर्यादा पुरूषोत्तम राम मुझे इन रावणों से छुड़वा कर वापस अयोध्या ले जायेंगे। पापा माँ आप चिन्ता मत कीजियेगा .... यह तो इस देश में होना ही था, परन्तु एक बात मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कोई कितना भी मुझे इस्लाम कबूल करवा ले परंतु सीता मन आत्मा से हिन्दु ही रहेगी, मेरे शरीर पर कोई अधिकार कर सकता है, परंतु मेरी आत्मा पर सिर्फ राम का ही अधिकार है और होगा। अच्छा पापा माँ विदा । इतना पढ़ते ही पासपोर्ट और बीजा पंडित जी के हाथ से छुटकर जमीन पर गिर गया। यशोधरा पंडित जी को पथराई नजरों से देख रही थी। पंडित जी टूटे हुए वृक्ष की तरह जमीन पर लहरा कर बैठ गए और बच्चों की तरह फफक कर रोने लगे। पति को रोता देख पत्नी की पथराई आँखों से आंसू बहने लगे। यशोधरा अपनी जगह से उठी और पंडित जी के पास जाकर बैठ गई। पंडित जी के कंधे पर धीरे से हाथ रखते हुए भींगे गले बोली - पंडित जी अब रोने से कुछ भी हासिल नहीं होगा ... पाकिस्तान में रहने का कर ;ज्ंगद्ध हम चुका चुके हैं। बेटी पाकिस्तानी हो जायेगी, तब हम दोनों हिन्दुस्तान क्या करने जायेंगे। चलिये आँसु पोंछ लीजिए और कल सुबह दुकान की चाभी अपने मुल्ला दोस्त से वापस ले लीजियेगा। यह सुन कर पंडित जी यशोधरा की तरफ घायल नजरों से देखे, उनकी आँखों में सब कुछ टूट कर बिखर चुका था। बड़े टूटे स्वर में बोले ..... यशोधरा दरारें आज और भी गहरी हो गई ... पर जीना होगा हमें इन दरारों के साथ।

 

 

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