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july2015
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संस्थापिका एवं प्रधान सम्पादिका--- डॉ० श्रीमती तारा सिंह
सम्पादकीय कार्यालय--- --- 1502 सी क्वीन हेरिटेज़,प्लॉट—6, सेक्टर—
18, सानपाड़ा, नवी मुम्बई---400705
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(m) :--- +919322991198

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हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी---मनमोहन भाटिया

 

वातानुकूलित दफ्तर में 20 डिग्री तापमान में ओम चड्ढा को पसीने छूटने लगे। ओम चड्ढा बेचैनी महसूस करने लगे। कुछ गड़बड़ है। फ़ोन पर सेक्रेटरी को बुलाया। सेक्रेटरी फौरन केबिन में उपस्थित हो गया।
"जी सर।"
"डॉक्टर....।" बस इतना ही कह सके ओम चड्ढा अपने सेक्रेटरी को और बेचैनी से सर इधर उधर करने लगे।
सेक्रेटरी ने देखा कि ओम चड्ढा पसीने से तर बतर कुर्सी पर बेचैनी से घबराहट और बदहवास स्थिति में है। उसने फौरन ऑफिस में और लोगों की मदद से कार में बिठाया और ऑफिस के नज़दीक जो भी हॉस्पिटल आया, वहीँ इमरजेंसी में ले गया। डॉक्टर ने बताया कि दिल का दौरा पड़ा है। तुरन्त आईसीयू में भर्ती किया। सेक्रेटरी ने ओम चड्ढा के पुत्रों को फ़ोन किया। कुछ ही देर में ओम चड्ढा का पूरा परिवार हॉस्पिटल में एकत्रित हो गया। सीनियर डॉक्टर ने कहा कि हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी। परिवार ने तुरन्त स्वीकृति दे दी।

ओम चड्ढा शहर के नामी बिल्डर थे। चड्ढा कंस्ट्रक्शन कंपनी के संस्थापक और चेयरमैन। शहर के नामी रईस ओम चड्ढा। तबियत की खबर सुनते ही उनके दोनों पुत्र अनिल और सुनील अपनी पत्नियो समेत हॉस्पिटल पहुंच गए। हॉस्पिटल में सबसे मंहगा कमरा बुक कर लिया। ओम चड्ढा की पुत्री रीता और जंवाई भी हॉस्पिटल में पहुंच गए। पूरा कुनबा ओम चड्ढा के समीप एकत्रित हो गए। वैसे ओम चड्ढा की दो पुत्रियां है। छोटी पुत्री गीता के पास पिता की तबियत का कोई सन्देश नहीं गया।

हार्ट सर्जरी के बाद ओम चड्ढा कमरे में शिफ्ट हो गए। दो दिनों तक अभी हॉस्पिटल में रहना है। शाम के समय ओम चड्ढा को होश आया। डॉक्टरों की टीम एकत्रित हो गई। जांच के पश्चात सीनियर डॉक्टर पंकज पाहूजा ने ओम चड्ढा से कहा "अब आप बिल्कुल ठीक हैं। दो दिन आराम कीजिये और सबसे ज़रूरी बात यह है कि कोई तनाव नहीं लेना है। दिल को खुश रखो। हंसो और मुस्कुराओ।"

"ठीक है।" हलके से मुस्कुराते हुए ओम चड्ढा ने जवाब दिया।
डॉक्टर पंकज ने परिवार के हर सदस्य से कहा कि दिल का दौरा खतरनाक और जबरदस्त था। समय पर हॉस्पिटल आने पर जान बच गई। ओम को कोई तनाव न दे।

डॉक्टर पंकज पाहूजा अगली सुबह राउंड पर थे। आज उनका कोई ऑपरेशन नहीं था और शाम में ओपीडी थी। सभी मरीजों को देखने के बाद ओम चड्ढा को देखने गए। पंकज की आदत थी, वे मरीजों से दोस्तों की तरह मिलते थे और उनके पहले नाम से संबोधित करते थे। कमरे में ओम अकेले थे। परिवार का कोई सदस्य नहीं था। एक नर्स ड्यूटी पर थी। कमरे में प्रवेश करने के पश्चात नर्स से खिड़की का पर्दा खोलने को कहा।

"ओम कैसे हो?"
"इट्स ओके।" ओम ने कुछ देर रुक कर बाहर खिड़की के झांकते कहा।"
ओम के सूखे और रूखे मन से बुझे हुए उत्तर को सुन कर डॉक्टर पंकज उसकी मनोदशा को समझ गया। ओम का चेकअप करते हुए डॉक्टर पंकज ने कहा "एक फीलिंग छुपी होती है, जब कोई कहता है – इट्स ओके।"
ओम चुप रहा। ओम की चुप्पी देख कर डॉक्टर पंकज ने हंसते हुए ओम के गंभीरपने पर कहा "दिल की बीमारी है, गंभीर मुद्रा छोड़ हंसना चालू करो यार ओम, भाभी जी नहीं नज़र आ रही है।"
"पत्नी तो दस वर्ष पहले साथ छोड़ गई।"
"याद सताती है।"
"जीवन साथी की याद उसके बिछुड़ने के बाद अक्सर आती है।"
"ठीक कहते हो ओम पर हकीकत में जियो। दिल पर बोझ मत रखो। याद आती रहनी चाहिए पर याद को बोझ न बनाओं। बच्चों के हवाले बिज़नस करो। घूमो फिरो। पहाड़ों की हसीं वादियों में ज़न्नत का आनंद उठाना शुरू करो मेरे यार। आराम करो, कुछ बचपन के शौक जो अधूरे रह गए हों, उनको पूरा करो। तुम जो गंभीर रह रहे हो। यह सेहत के दुश्मन है। फ़िक्र किस बात की है, अगर दिल में कोई दर्द बिठा रखा है तो यारों के साथ मिल बांट कर हल्का करो दिल को। इतना बड़ा बिज़नस एम्पायर खड़ा कर रखा है। बच्चे संभाल लेंगे।" कह कर डॉक्टर ने एक कागज़ का पर्चा ओम को दिया। "इसको पढ़ो और अमल करो। इस की कॉपियां करके यारों, दोस्तों में बांटो।"

तभी कमरे में ओम के बड़े लड़के अनिल ने प्रवेश किया और डॉक्टर से पूछा "अंकल, पापा कैसे हैं।"
"पापा एक दम भले चंगे हैं। किसी बात की टेंशन नहीं देनी। बेफिक्र रखो पापा को, दो दिन बात घर जा सकते हैं। मैं तो सिफारिश करता हूं कि किसी हिल स्टेशन पर पापा को रहने भेज दो।"
"मसूरी में अपना मकान है। कुछ दिन वहीँ रह लेंगें।"
"मैं तो राय देता हूं कि हॉस्पिटल से सीधा मसूरी ही जाए।"
"जी अंकल।"
डॉक्टर पंकज चले गए और ओम ने दलिया खा कर डॉक्टर का दिया कागज पढ़ा। कागज़ में कुछ पंक्तियां लिखी थी।
"एक गहरी बात छुपी होती है। जब कोई कहता है – पता नही।
एक समन्दर छुपा होता है बातों का। जब कोई खामोश रहता है।
एक सच छुपा होता है। जब कोई कहता है – मजाक था यार।
एक फीलिंग छुपी होती है। जब कोई कहता है – इट्स ओके।
इक जरूरत छुपी होती है। जब कोई कहता है – मुझे अकेला छोड दो।
इसीलिए ओपन हॉर्ट सर्जरी यूनिट के बाहर हमने लिखा हुआ है
अगर दिल खोल लिया होता अपने यारों के साथ, तो आज खोलना नही पडता औजारों के साथ।”
आखिरी शब्द ओम चड्ढा के दिल में सीधे उतर गए "अगर दिल खोल लिया होता अपने यारों के साथ, तो आज खोलना नही पडता औजारों के साथ।”
पढ़ कर ओम ने कागज़ अनिल को दिया "डॉक्टर मजाकिया है। पर लिखा सही है, दिल में दबी बातें बोझ बन कर हार्ट अटैक करवाती है। अनिल तुम क्या कहते हो, कुछ दिन छुटी करके मसूरी मैं रहूं तो कैसा रहेगा।"
"पापा आप किसी बात की चिंता न करें। मैं हूं, सुनील है, आप निश्चिन्त हो कर मसूरी में स्वास्थ्य लाभ करें। टेलीफोन हैं। इंटरनेट है, आपकी सलाह मशवरे के लिए बातें होती रहेंगी।"

मसूरी में कैमल बैक रोड पर छूता हुआ मकान ओम चड्ढा ने गर्मियों की छुट्टियों में रहने के लिए बहुत पहले लिया था। दस साल हो गए, वहां गए। पत्नी के देहांत के बाद ओम चड्ढा मसूरी नहीं गए। बच्चे अब विदेश में छुट्टियां बिताना पसंद करते हैं। मसूरी का मकान केयरटेकर भोला प्रसाद के हवाले है। हर तीसरे महीने रख रखाव के लिए पैसे लेने आ जाता था। एक कमरे में भोला प्रसाद अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता है। अनिल और सुनील तो भोला प्रसाद की शक्ल देख कर मुंह बना लेते थे कि पापा ने भोला प्रसाद को सर पर चड़ा रखा है। खाली मकान में हर महीने हज़ारों का खर्च लिख लाता है, परंतु ओम चड्ढा को मसूरी के मकान से विशेष प्यार था। हर वर्ष पत्नी के साथ दो महीने गर्मियों में इसी मकान में रह कर बिताते थे। हर रोज़ हाथों में हाथ डाले कैमल बैक रोड पर विचरण करना और प्रकृति के सौंदर्य को निखारना। स्कूल की छुट्टियों में बच्चे अनिल, सुनील, रीता और गीता का बचपन मसूरी में बीतता था। वो धूप में अचानक से बादलों का आना और बदन में झुरझरी सी उत्पन कर देना। दशहरे के मौसम में हलकी गुलाबी ठण्ड के बीच धुंध का घर में आना बच्चों को रोमांचित कर देता था और ओम चड्ढा का रोमांस कई गुणा अधिक कर देता था। साफ़ मौसम में कमरे की खिड़की से देहरादून की चमचमाती लाइट्स का नज़र आना। यह सब दिल्ली की कोठी में कहां। हॉस्पिटल के बेड पर लेटे हुए ओम चड्ढा अतीत में चले गए। नर्स की आवाज़ सुन कर ओम चड्ढा वर्तमान में आ गए जो उन्हें दवाई लेने के लिए कह रही थी। दवाई लेने के बाद अनिल से ओम चड्ढा बोले "बेटे भोला प्रसाद को फ़ोन करके मकान की साफ़ सफाई करवा लो। मैं एक हफ्ते बाद कुछ दिन के लिए मसूरी रहना चाहूंगा।"

"जैसे आपकी इच्छा। आप चिंता न करे मैं आपके साथ चलूंगा।"
"ठीक है, कुछ दिन तुम भी रहो, तुम्हे याद है अनिल स्कूल की सारी छुट्टियां मसूरी में बिताते थे, कितना मज़ा आता था।"
"हां पापा, वो भी क्या दिन थे।"
"बच्चों को भी साथ ले चलो।"
"अभी तो उनके एग्जाम हैं अगले हफ्ते। छुट्टियों में बच्चों को ले चलेगें।"
दो दिन बाद ओम चड्ढा को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई।
"डॉक्टर साहब, आपका वो कागज़ का छोटा सा पुर्ज़ा बड़े काम का है। वो शब्द बड़े काम के हैं।"
"दिल खोल कर बोलो, कि शब्दों ने जादू कर दिया।"
"अगर दिल खोल लिया होता अपने यारों के साथ, तो आज खोलना नही पडता औजारों के साथ।"
"ओम दिल खोल कर रखो यारों के साथ, नहीं पड़ेगी जरूरत दुबारा औज़ारों की।" डॉक्टर पंकज ने ठहाका लगाया तो ओम चड्ढा भी उसके ठहाके में शामिल हो गए।
"ओम, हमें बुलाओगे मसूरी में।"
"साथ चलो मेरे।"
"साथ तो नहीं चल सकता, अभी बहुत सारे औज़ार चलाने है।" कह कर डॉक्टर ने फिर ठहाका लगाया।

हॉस्पिटल से छुट्टी के पश्चात ओम चड्ढा दो दिन घर रहे फिर रविवार की सुबह कार में बड़े बेटे अनिल के साथ मसूरी के लिए रवाना हुए। अनिल दो दिन रुक कर सारे इंतज़ाम देख कर दो दिन बाद दिल्ली आ गए। मसूरी में ओम चड्ढा अकेले स्वास्थ्य लाभ करने रुक गए। धूप निकलने पर ओम चड्ढा घर से निकलते और आस पास घूम कर आ जाते। पत्नी के साथ बिताये पल याद आते। भोला प्रसाद और उसकी पत्नी ओम चड्ढा के खानपान का ख्याल रखते। ओम चड्ढा दिन में एक बार फ़ोन पर बेटों से व्यापार का हालचाल ले लेते। रविवार की दोपहर खाना खाने के पश्चात् ओम चड्ढा दोपहर मॉल रोड पर चहल कदमी कर रहे थे। थक कर एक बेंच पर बैठ गए। दूर पर्वत श्रृंखला पर चमकती धूप देखते हुए पुरानी बातें याद आने लगी। तभी पांच लड़कियों का एक ग्रुप बातें करता हुआ निकला। उनके पीछे एक लड़की ने आवाज़ दी और लड़कियों का ग्रुप ओम चड्ढा के पास रुक गया। वह पीछे वाली लड़की उनके साथ थी और किसी कारण उनसे पीछे रह गई थी।

"जल्दी आ वृन्दा, जल्दी।"
"रुको, आई।" कह कर भागते हुए वह लड़की, जिसका नाम वृन्दा था, आई। मॉल रोड की चढाई में भागते हुए उसका सांस फूल गई। "अरे रुको यार, दम तो लेने दो।" वृन्दा आ कर ओम चड्ढा के पास बेंच पर बैठ गई। उम्र सोलह, सत्रह के आस पास सब लड़कियों की लग रही थी। इस उम्र की लड़कियां चटर बटर बहुत करती है। ओम चड्ढा उनकी बातें सुनने लगा। वृन्दा नाम की जो लड़की उसके पास बेंच पर बैठी थी, की सूरत देख कर ओम चड्ढा देखते रह गए और पुरानी यादें ताज़ा हो गई। ओम चड्ढा को अपनी छोटी बेटी गीता की याद आ गई। बिलकुल गीता लग रही है। बिलकुल वही शक्ल, वही रंग, कद काठी, हंसने का अंदाज़ बिलकुल गीता जैसे। पांच मिनट बाद लड़कियां तो चली गई पर ओम चड्ढा अतीत में चले गए। छोटी लड़की गीता ओम चड्ढा की लाड़ली, दुलारी थी। सबसे अधिक प्रेम गीता पर बरसा। बाकी बच्चे अनिल, सुनील और रीता शिकायत करते कि उन्हें मार पड़ती थी और गीता को प्यार। ओम चड्ढा ने शायद ही गीता की पिटाई की हो। गीता के जनम के बाद ओम चड्ढा के बिज़नस ने एक लंबी छलांग मारी, जहां से मुड़ कर फिर कभी नहीं देखा। गीता का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने लव मैरिज की थी। ओम गीता का विवाह एक धनी परिवार में करना चाहते थे, जिनका ओम के साथ गहरा व्यापारिक संबंध भी थे। गीता ने विवाह से मना कर दिया और अपने साथ कॉलेज में पढ़ने वाले साथी गगन को चुना। गगन के पिता सरकारी नौकरी में थे, माता स्कूल टीचर, कुल मिला कर एक मध्य वर्गीय परिवार, जो ओम चड्ढा के व्यापार, रुतबे और धन की बराबरी नहीं कर पाया। पूरे परिवार के विरुद्ध गीता ने गगन से कोर्ट मैरिज की और ओम चड्ढा ने अपनी लाड़ली गीता से नाता तोड़ लिया। दस साल पहले जब ओम चड्ढा की पत्नी का देहांत हुआ, तब गीता मां के उठाले पर आई, परंतु ओम चड्ढा ने पूरी बिरादरी के सामने गीता का तिरस्कार कर दिया। रुआंसी गीता के स्वाभिमान पर चोट ने उसे पिता से सदा के लिए दूर कर दिया। लगभग बीस वर्ष हो गए गीता के विवाह को। ओम चड्ढा चाहे जितना कहें कि उनके चार नहीं तीन बच्चे अनिल, सुनील और रीता ही हैं और गीता उनके लिए मर चुकी है, परंतु दिल के किसी कोने में गीता सदा बसी रही। सामने नहीं आई, पर अपने दिल के टुकड़े को कोई नहीं भूल सकता है। यही बोझ दिल के दौरे में परिवर्तित हो गया। कभी किसी से कोई बात, चर्चा नही, बोझ को दिल में दफ़न किया हुआ था। डॉक्टर पंकज ने शायद क्या बिलकुल ठीक ही कहा, दिल खोला होता यारों के साथ तो नहीं खोलना पड़ता औज़ारों के साथ। वृन्दा को देख गीता की याद आ गई। घर वापिस आ कर बिस्तर पर लेटे पर नींद गायब थी। बंद आंखों में भी गीता और वृन्दा की शक्लें सामने आती रही। बदहवास से ओम चड्ढा ने घंटी बजाई तो भोला प्रसाद हाज़िर हो गया।

"क्या चाहिए मालिक?"
"पानी और दवाई।"
दवा लेने पर ओम चड्ढा की हालात में सुधार हुआ और नींद आ गई। शाम के समय ओम चड्ढा भोला प्रसाद के साथ मॉल रोड तक गए। मॉल रोड पर वोही लड़कियों का ग्रुप दिखा, जो पिकनिक के बाद अपने घर जा रहा था। वृन्दा फिर दिखी और उसको देख कर ओम चड्ढा बेंच पर बैठ गए।
"भोला, तुम्हे गीता याद है।"
"गीता बिटिया।"
"हां, भोला, गीता।"
"याद है मालिक।"
"अभी जो लड़कियों का ग्रुप गया है, उसमें एक लड़की की शक्ल गीता से मिलती है। दोपहर में में इसी बेंच पर आराम कर रहा था, तब यही ग्रुप यहां से निकला था और वो लड़की बेंच पर दो मिनट आराम करने बैठी थी, बिलकुल गीता जैसी, वैसा रंग, वैसी आवाज़, वैसी हंसी और बिलकुल वैसा रंग, कद काठी। उसको देख वर्षों बाद गीता की याद आ गई।"
भोला प्रसाद कुछ नहीं बोला, बस ओम चड्ढा की बात सुन कर उनकी शक्ल देखने लगा। वह गीता के बारे में जानता था, और यह भी कि मालिक गीता बिटिया से नफरत करते हैं। वह चुप चाप देखता रहा। वह मालिक को नाराज़ नहीं करना चाहता था।
"मालिक, मैंने ध्यान से देखा नहीं।" कह कर भोला प्रसाद ने बात टाल दी।
भोला ने तो बात टाल दी, परंतु ओम भूल नहीं पा रहा था। बुझी चिंगारी दहकता शोला बन गया था। रात के खाने के बाद ओम चड्ढा ने भोला प्रसाद को अपने पास रोका और गीता के बारे में बात करते रहे।
"भोला, उस अलमारी में फ़ोटो एल्बम रखी होती थी, लेकर आओ।"
भोला पुरानी फ़ोटो एल्बम ले आया। गीता की फ़ोटो देख कर भोला से बोले "भोला, यह फ़ोटो देखो, गीता की उम्र अठारह की थी, जब यह फ़ोटो यहीं कैमल बैक रोड में खींची थी। देखो, वो लड़की बिलकुल गीता जैसी ही है। भोला पता करो, कहां रहती है वो, मैं उससे मिलना चाहता हूं। तुम्हारी ड्यूटी है, उसको ढूंढना।"
भोला प्रसाद ने ओम चड्ढा के चेहरे को पढ़ा। एक बच्चे सी जिज्ञासा, उतावलापन देख भोला से रहा नहीं गया।
"मालिक, अगर नाराज़ नहीं हों और जान की खैरियत हो तो एक बात कहूं।"
"भोला, तुम बेफिक्र हो कर कहो, क्या बात है।"
"जी, जिस लड़की की बात आप कर रहे हो, वो आपकी नातिन है। गीता बिटिया की लड़की, वृन्दा नाम है।"
"क्या कह रहे हो, भोला।" भोला की बात सुन कर ओम का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया। "तुम क्या जानते हो, वह कहां रहती है।"
"जी, पिक्चर पैलेस के पीछे।"
"भोला, मुझे अभी वहां ले चलो, मैं मिलना चाहता हूं।" कह कर ओम चड्ढा बिजली की तेजी से बिस्तर से उठे, शाल ओढ़ी और चप्पल पैरों में डाली। "चलो भोला, तुरंत, देर मत करो।"

ओम चड्ढा और भोला प्रसाद मॉल रोड पर चलते चलते बातें कर रहे थे। टूरिस्ट सीजन नहीं था। मॉल रोड सुनसान था। ओम ने पूछा "तुम कैसे जानते हो कि गीता मसूरी मैं रहती है।"
"गीता बिटिया एक दिन मॉल रोड पर मिली थी, तब पता चला। एक साल से यहीं हैं। गगन जी बैंक में ब्रांच मैनेजर हैं।"
"कुछ छुपाओ नहीं, जो मालूम हो, बताओ।"
"मुझे बस इतना ही मालूम है। आप नाराज़ रहते है गीता बिटिया से, इसलिए अधिक मिलना नहीं हुआ। सोचा यदि आपको पता चल गया तो कहीं नौकरी से निकाल दिया तब इस उम्र में कहां जाऊंगा।"
"मुझे लग रहा है कि भोला तू बदमाश है, मुझसे छुपा रहा है। ठीक है, मत बता, मैं खुद मालूम कर लूंगा।"

बातों बातों में रास्ता कट गया। हलकी हलकी गुलाबी ठंड शुरू हो गई थी। पिक्चर पैलेस के नीचे एक शोरूम के ऊपर प्रथम तल में गीता किराये पर रह रही थी। लकड़ी की सीढ़ियां चढ़ कर ओम चड्ढा भोला प्रसाद के साथ ऊपर गए। दरवाज़ा बंद था। डोर बेल अंधेरे में नज़र नहीं आई। ओम ने कुंडी खटखटाई। अंदर टीवी चलने की आवाज़ आ रही थी। कुंडी दो तीन बार खटखटाई, परंतु शायद टीवी की आवाज़ में कुंडी की आवाज़ अंदर घर में किसी को सुनाई नहीं दी। तभी अंधेरे में ओम चड्ढा का हाथ अचानक से डोर बेल पर लगा। घंटी की आवाज़ सुन कर दरवाज़ा खुला, वृन्दा ने सीढ़ियों की बत्ती जलाई और दरवाज़ा खोला। वृन्दा ओम चड्ढा को नहीं पहचान सकी परंतु ओम चड्ढा वृन्दा को देख कर प्रसन्न हो गए। रोम रोम पुलकित हो गया।

"जी किससे मिलना है?" वृन्दा ने पूछा।
"गीता घर मैं है।" ओम चड्ढा ने प्यार से कहा।
"मम्मी, देखना, कोई आपसे मिलना चाहता है।"
"अंदर बिठाओ, मैं आती हूं।" गीता ने उत्तर दिया। वह रसोई में खाना बना रही थी।
वृन्दा ने ओम चड्ढा को अंदर आने को कहा। ओम चड्ढा के पीछे भोला को देख कर बोली "काका, तुम्हे तो देखा ही नहीं। छुप कर खड़े हो। नज़र ही नहीं आए।" फिर गीता को आवाज़ दी "मम्मी भोला काका भी आए हैं।"
रसोई में खाना बनाते हुए गीता ने कहा "भोला काका बैठों, मैं फुल्के बना कर आती हूं।"
"गगन जी नज़र नहीं आ रहे।?"
"बस अभी आते ही होंगे। बैंक में ज़रूरी काम था, कुछ पेपर हेड ऑफिस आज ही भेजने थे। बैंक से निकल चुके है। अभी फ़ोन आया है, बस आते ही होंगे। बस फुल्के बना रही हूं।"
"दो और बना लो।"
भोला की दो और फुलको की बात सुन कर गीता ने हंस कर कहा। "काकी को भी वे आते। बिना काकी के रोटी खाओगे।"
उम्र में बड़े भोला प्रसाद को सब बच्चे काका कहते थे। वृन्दा दूसरे कमरे में चली गई। पांच मिनट बाद गीता रसोई से बाहर आई। बैठक में पिता ओम चड्ढा को देख गीता खड़ी की खड़ी रह गई। ओम चड्ढा गीता को देख कर लगभग रो पड़े। ओम चड्ढा की आंखों से आंसू छलक गए।
"गीता...।"
"पापा...।"
बस दोनो बेटी पिता खड़े खड़े इतना ही कह सके। वृन्दा भी दूसरे कमरे से आ गई। गगन भी घर वापिस आ गया। घर का दरवाज़ा खुला था। गीता को चुपचाप खड़े देख गगन आश्चर्यचकित हो गया। फिर ससुर ओम चड्ढा को देख गगन खामोश ही रहा। हाथ में सब्ज़ी और फलों का थैला था, उसे चुपचाप रसोई में रख दिया और चुपचाप कुर्सी पर बैठ गया। कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। वृन्दा आश्चर्यचकित थी कि ये शख्स कौन हैं और मम्मी पापा खामोश क्यों हो गए हैं। वर्षो बाद गीता अपने पिता को अचानक सामने देख चुप हो गई कि जिस पिता ने उसके प्रेम विवाह के कारण उसे घर से निकाल दिया और मां के अंतिम संस्कार के समय भी तिरस्कार किया था, आज क्यों और कैसे, किस मकसद से उससे मिलने बिना बताए आ गए।

गगन सोच रहा था कि एक उद्योगपति ससुर, जिसने उसको कभी जंवाई नहीं समझा क्योंकि वह मध्यवर्गीय परिवार से था और विवाह के समय बैंक में सिर्फ क्लर्क था। आज बीस वर्ष बाद वह ब्रांच मैनेजर बन गया है, लेकिन एक उद्योगपति की बराबरी तो नहीं कर सकता है।
वृन्दा को नहीं मालूम था कि ओम चड्ढा उस के नाना हैं। गीता और गगन ने कभी बताया नहीं। जब रिश्ते ही छूट जाएं, दरार हो जाए, कभी कोई गीता से मिलने नहीं आया, वृन्दा कैसे जान पाती कि उसका नौनिहाल कैसा है।
भोला प्रसाद तो केवल एक नौकर है, वह केवल सबको देखता रह गया।
किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था। वृन्दा ने ही हल निकाला। सब के सूखे गले देख झट से रसोई में गई और पानी के गिलास ला कर सबको दिए। गीता ने पानी पिया। पानी पीने के बाद "पापा बैठिये, बहुत कमज़ोर दिख रहे हो।"
कुर्सी पर बैठते हुए ओम चड्ढा बोले "कमज़ोर मैं नहीं तू लग रही है। एकदम पीला चेहरा, मुरझाया शरीर। क्या हाल बना रखा है?"
"मैं बिलकुल ठीक हूं। अपनी नातिन से मिलो, वृन्दा तुम्हारे नाना।"
कुछ पल के लिए वृन्दा देखती रही फिर झुक कर ओम चड्ढा के चरण स्पर्श किये। ओम चड्ढा ने वृन्दा को गले लगाते हुए कहा "बेटे हमारे यहां बेटियां चरण स्पर्श नहीं करती हैं। आज दोपहर तुम कुछ लड़कियों के साथ मॉल रोड गई थी न।"
"हां, आज स्कूल की पिकनिक केम्पटी फॉल में थी। हम सबने लाइब्रेरी पर एकत्रित होना था।"
"बेटे, तुम भाग कर आ रही थी और हांफने के कारण बेंच पर बैठी थी। मैं वहां बैठ कर आराम कर रहा था। तुम्हे देखते ही गीता की याद आ गई। गीता तुम्हारी उम्र में एकदम तुम जैसी थी। एक सा रंग, कद काठी और बोलने का अंदाज़। मैं हैरत में था कि दो शख्स एक जैसे कैसे हो सकते हैं। सिर्फ मां बेटी हो सकते है।"

ओम चड्ढा तो सहज हो चुके थे, परंतु गीता और गगन अभी भी सहज नहीं हुए थे। ओम चड्ढा जब गीता के घर आए थे तब गीता रसोई में खाना बना रही थी। ओम ने भोला प्रसाद को कहा, खाना तैयार है, तुम रसोई से लाओ, सब मिल कर खाना कहते हैं।
"गीता मैं समझ सकता हूं कि तुम और गगन मेरे से नाराज़ हो, पर अब गुस्सा थूक दो। मैं मांफी मांगता हूं। जो हुआ, भुलाया नहीं जा सकता पर दुनिया गोल है। हम बिछुड़ते हैं, फिर मिलते हैं। बीस वर्षो की बात है। मैं समझ सकता हूं, तुम सबके दिल की बात पर यह बात मुझे बीस वर्ष बाद समझ में आई। चलो छोडो, पहले खाना खाते हैं। हां, भोला सबको खाना डालो।"
खाना खाने के बाद ओम चड्ढा ने भोला प्रसाद को वापिस भेज दिया और वे गीता के घर रुक गए "बेटा, बुरा मत मानो, हमारे यहां बेटी के घर रहना अच्छा नहीं समझा जाता, पर मैं प्रायश्चित करना चाहता हूं, तुमसे अपने दिल की बातें कर के। ओम चड्ढा ने डॉक्टर पंकज की बात बताई और उनका दिया कागज़ का टुकड़ा दिखाया। तुम भी पढ़ो। कटु सत्य लिखा है।

"एक गहरी बात छुपी होती है। जब कोई कहता है – पता नही।
एक समन्दर छुपा होता है बातों का। जब कोई खामोश रहता है। तुम सब खामोश हो। समझ सकता हूं, कि दिल के समन्दर में ज्वार भाटा होगा।
एक सच छुपा होता है। जब कोई कहता है – मजाक था यार।
एक फीलिंग छुपी होती है। जब कोई कहता है – इट्स ओके।
इक जरूरत छुपी होती है। जब कोई कहता है – मुझे अकेला छोड दो। अब मुझे मत कहना कि तुम सबको अकेला छोड़ दूं। हम चाहे कुछ भी कहे, अकेलापन हमें परेशान करता है।
इसीलिए ओपन हॉर्ट सर्जरी यूनिट के बाहर हमने लिखा हुआ है
अगर दिल खोल लिया होता अपने यारों के साथ, तो आज खोलना नही पडता औजारों के साथ।” तुम्हे घर से निकाला, पर दिल के किसी कोने में तुम हमेशा रही। किसी से कह नहीं सका, अगर किसी से बात करता, दिल का हाल बांटता, हो सकता कि कोई यार, हमदर्द काम की सलाह देता और आज बीस वर्ष बाद न मिलते, पहले मिलते। मेरी बात छोड़ो, उम्र हो गई है, बीमारी तो लगी रहेगी। तुम्हे क्या हो गया है। पीला चेहरा, मुरझाया बदन। तुम भी दिल की बातें खोलो। जो भड़ास है, निकाल दो आज, मैं बुरा नहीं मानूंगा। गगन, आज तुम बोलो कुछ, सोचो पुराना यार मिला है, दिल खोल कर कहो, अच्छा, बुरा।"

गगन ने बताना शुरू किया कि तीन साल पहले गीता को कैंसर हो गया था। ऑपरेशन, कीमोथेरपी और रेडिएशन में एक वर्ष दर्द के साथ बीता। इतनी बड़ी बीमारी और सर्जरी के बाद गीता ढल गई। आप ने सही पहचाना, वृन्दा बिलकुल गीता ही है। कॉलेज में जब एक साथ पढ़ते थे, तब की गीता और आज वृन्दा बिलकुल एक हैं। बैंक की नौकरी में तबादले होते रहे, बीस वर्षो में हरिद्वार, चेन्नई, इंदौर, हैदराबाद, अहमदाबाद, जयपुर और चंडीगढ़ में रहे। वृन्दा के स्कूल बदलते रहे। हर जगह के स्कूल में पढ़ी और विभिन्न प्रांतों में रहने के कारण वृन्दा आज हिंदी और इंग्लिश के साथ साथ तमिल, तेलुगु, गुजराती और बंगला भाषाओँ में निपुण है। कैंसर के इलाज़ के बाद मसूरी में तबादला करवा लिया। यहां का मौसम गीता को भाता है। सोचता हूं कि अब यहां से कहीं और न जाऊं, परंतु वृन्दा की बारहवी की परीक्षा है, कॉलेज के लिए दिल्ली जाना पड़ेगा, पर मैं जाना नहीं चाहता न ही गीता।"

"पर क्यों?" दिल्ली न जाने की बात पर ओम चड्ढा को उत्सुकता हुई।
"आप के लिए, आप सब दिल्ली रहते हैं, इसीलिए दिल्ली में कभी नहीं रहे। पूरा भारत घूमे, दिल्ली से दूरी बना कर रखी।" गीता ने कहा।
"मैंने दिल से सब गिले शिकवे निकाल कर फैंक दिए हैं। तुम भी निकाल दो। वृन्दा के कॉलेज की चिंता न करो। दिल्ली में या किसी भी दूसरे शहर में, यहां अच्छी शिक्षा मिले, वहीँ वृन्दा को पढ़ाना है।"

गीता और गगन दो कमरों के मकान में रह रहे थे। एक दिन में बैठक और रात में वृन्दा का बेड रूम बनता था। दूसरा कमरा गीता और गगन का बैडरूम था। रात में ओम चड्ढा नातिन वृन्दा के साथ बैठक में ही रहे। काफी देर तक बातें करते रहे। फर्श पर बिस्तर बिछा कर सोये। सुबह उठे और खिड़की से नीचे देखा। लोगों की चहल पहल शुरू हो गई थी। कैमल बैक रोड पर ओम चड्ढा का मकान एकान्त में था, वहां टूरिस्ट सीजन में ही पर्यटको की हलचल होती है। ओम चड्ढा ने अगली सुबह अपनी इच्छा ज़ाहिर कि गीता, गगन और वृन्दा सब उसके साथ रहें परन्तु गीता ने मना कर दिया कि शादी के बाद लड़की का घर उसका ससुराल होता है, मायका नहीं।

"ठीक है, पर मायके पर भी पूरा हक़ रहता है। बच्चों के साथ कुछ दिन ही सही, रहना लड़की का हक़ बनता है। नातियों का नानी घर पर पूरा अधिकार होता है।" ओम चड्ढा ने यह कह कर रुक्सत की। गीता से मिलने के बाद ओम चड्ढा ने मसूरी ही बसने का मन बना लिया और अपने बेटों अनिल और सुनील से कहा कि वे व्यापार संभाले। खुद रिटायरमेंट लेना चाहते हैं। अब उनकी भूमिका एक गुरु और मेंटर की रहेगी। मसूरी मकान में एक सेकेट्री रख लिया जो बिज़नस की पूरी रिपोर्ट देता रहता था। गीता, गगन और वृन्दा ओम चड्ढा के साथ छुट्टी वाले दिन कुछ समय व्यतीत करते।

एक दिन गगन ने गीता से पूछा "पापा, बीस वर्ष बाद हमें अपनाने के लिए व्याकुल लग रहे है, परंतु बीस वर्षो की दूरी दिल से निकल नहीं रही।"
"अपने पिता से बैर क्या रखना, जब दूर थे, तब कोई बैर दिल में नहीं रखा। अब नज़दीक आ रहे है, तब क्यों बैर रखे। कभी हमने कोई मदद नहीं ली, अब भी नहीं लेंगे। अपने सीमित साधनों में ही रहना है। जो बीस वर्ष बीत गए, उनकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। हम जैसे है, ठीक हैं, थोडा है हमारे पास, थोड़े की ही ज़रूरत है। अधिक नहीं चाहिए।"
"ठीक कह रही हो, कभी कभी मिलने से उनको प्रसन्ता होती है, तो हमें मिलना चाहिए। खुद में सीमित रहेंगें, हमारे लिए अच्छा होगा।"

 

ओम चड्ढा ने नववर्ष के उपलक्ष्य पर पूरे कुटुंब को मसूरी आमंत्रित किया। 31 दिसम्बर को दोनों पुत्र अनिल, सुनील पत्नियों और बच्चों समेत, पुत्री रीता, जंवाई और बच्चे सभी मसूरी वाले मकान में एकत्रित हुए। लगभग बीस वर्ष बाद सभी मसूरी में एक साथ एकत्रित हुए। शाम के समय ओम चड्ढा खुद गीता, गगन और वृन्दा को बुलाने उनके घर गए। पिता के साथ घर में प्रवेश करते गीता को देख पूरा कुटुंब आश्चर्यचकित हो गया। बीस साल बाद गीता अपने भाई, बहन से मिल रही थी। किसी ने कुछ नहीं कहा। सभी सोच रहे थे कि पिताजी को क्या हो गया है, जिस गीता के नाम से चिढ़ते थे, आज गले लगा कर मिल रहे है। जिस बात की कोई कल्पना नहीं कर सकता था, वो आज हो रहा था। ओम चड्ढा ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा "आप सब को आश्चर्य ज़रूर हो रहा होगा कि जिस गीता से में नफरत करता था, आज प्यार कैसे कर रहा हूं। हॉस्पिटल में डॉक्टर पंकज का प्रसंग सुनाया और गीता से कैसे मुलाकात हुई, सबको बताया। गीता कैंसर की बड़ी बीमारी से लड़ कर अपनी ज़िन्दगी गौरव पूर्ण जी रही है। मैं उसकी खुद्दारी को ठेस नहीं पहुंचना चाहता, परन्तु मैं एक अपराध बोध से ग्रस्त हूं। मैंने अपने दिल के टुकड़े, सबसे अधिक चहेती बेटी को अपने से दूर रखा। मैं यह मसूरी वाला मकान वृन्दा को उपहार में दे रहा हूं। यह नव वर्ष का तोहफा एक नाना का अपनी नातिन को।"
कह कर ओम चड्ढा ने वृन्दा को गले से लगा लिया। ओम चड्ढा की आंखों में आंसू थे। सभी चुप थे। अनिल, सुनील और रीता को समझ नहीं आ रहा था कि इस घोषणा को स्वीकार करें या विद्रोह में कुछ कहें। इससे पहले कोई कुछ कहता, ओम चड्ढा ने आगे कहा "मैंने गिफ्ट डीड बनवा ली है, सोमवार को रजिस्ट्रार के ऑफिस में गिफ्ट डीड पंजीकृत करवा कर मकान ट्रांसफर की औपचारिकता पूरी हो जाएगी।"
कुछ देर की चुप्पी के बाद ओम चड्ढा ने फिर कहा "तुम सब की चुप्पी से मैं समझ सकता हूं कि मेरा निर्णय किसी को पसंद नहीं आया। मैं सबको बताना चाहता हूं कि सबकी संपति, जायदाद, व्यापार के आगे यह भेंट कुछ नहीं हैं। मैं किसी की न नहीं सुनना चाहता।"
न चाह कर भी सबको ओम चड्ढा का निर्णय स्वीकार करना पड़ा।
"भोला प्रसाद खाने का समय हो गया, खाना सबको परोसो।"

 

सबने चुपचाप खाना खाया। दो दिन बाद अनिल, सुनील और रीता का परिवार वापिस दिल्ली चला गया। सोमवार को गिफ्ट डीड का पंजीकरण हो गया और गीता, गगन और वृन्दा पिता ओम चड्ढा के साथ रहने लगे।

 

 

 

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