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july2015
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प्यार का इजहार --अमरनाथ मूर्ती

 

जब से उसको देखा मै उसके प्यार मे हो गया बेकरार
गलत फहमी मे कर बैठा उससे प्यार का मै इजहार
उसने थोड़ा भी वक्त नहीं लिया करने को मुझे इनकार
मैंने भी ठान ली के करवाऊँगा एक दिन मै उससे इकरार
मैंने कहा:प्यार नहीं तो दोस्ती तो मेरी कर लो स्वीकार!
उसने भरी हामी मिला मौका उसकी संगत का बार बार

 

दोस्ती का फर्ज निभाने को मै साथ देता उसका अक्सर
मै बॉडीगार्ड बन के उसका रहता साथ था उसके दिन भर
एक दिन मै अपनी मोपेड मे ले गया उसे रकीब के घर
इस तरह मिला मुझे मौका करने का उसके साथ सफ़र
पहल देख उसकी रकीब इतराया भाव खाया भर भर कर
बड़ी बेरुखी से दरवाजा खोला उसने एहसान सा जताकर
रवैये काउसके पड़ा गहरा प्रेमिका के दिल पर यूं असर
छोड़ कर दर रकीब का चुपचाप चली आई वो मेरे घर
मौके की नजाकत पे मै बोला छोटा ना कर अपना जिगर
अहम मेरे लिए खुशी है तेरीभले तू ऐतबार न कर
मुझे फर्क नहीं पड़ता तू मुझसे प्यार कर या न कर
जीता हूँ और मरने मे भी ना छोड़ूँ कोई भी कसर
छोड़ दूंगा जहां भीमौत से मुझको नहीं कोई डर
रात को सोता हूँ तेरी तस्वीर को सिरहाने पे रखकर
ख़्वाब जो भी कभी देखूं सिर्फ आती है तू ही नजर
सुबह उठता हूँ तेरे ही नाम की माला जपकर
ख्याल तेरा ही रहता है मुझे हर घड़ी हर पहर
नजर आता है यूं मुझको तेरी आँखों में समंदर
मरना मै चाहता हूँ बस गहराई मे उसकी डूबकर
मेरी एक ही है तमन्ना रहे खुश तू यूं जीवन भर
चाहे पड़े के न पड़े इस बात का तुझ पे कोई असर
आजमा ले मुझे चाहे तो ले आ एक प्याला भर जहर
उसको भावुक करने में मैंने छोड़ी नहीं थी कोई भी कसर
बात रखी जिस अंदाज से भर आई आँख उसकी सुनकर
एक टक देखते हुए आई वो हौले हौले पास मेरे चलकर
भरे दिल से कहा उसने मुझको अपनी नर्म सी बाँहों में भरकर
ढूंढती रही आज तलक जिस आशिक को तुझमे आया है वो नजर
तू ही मजनू तू ही महिपाल है और तू ही बनेगा मेरा हमसफ़र
जिस नजाकत से किया इजहारे प्यार वो तरकीब हो गयी कारगर
आज मै खुश हूँ आबाद हूँ साथ उसके एक नयी सी दुनिया बसाकर
सच्चा प्यार आखिर मिल ही जाता है भले ही देर होती है अक्सर

 

 

अमरनाथ मूर्ती

 

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