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july2015
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संस्थापिका एवं प्रधान सम्पादिका--- डॉ० श्रीमती तारा सिंह
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रिश्ते तूत के----डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

जवानी के दिनों में चारो ओर से आदमी से घिरा रहनेवाला, इंजीनियर बेटा का पिता बैजू, जिंदगी के अंतिम ढ़लान पर मिट्टी के दालान घर में, अपनी घोर दरिद्रता के साथ अकेले ही जीने के लिए मजबूर था । उसके मुख पर आत्म-गौरव की जगह, वेदना छाई रहती थी । उसकी आत्मा किसी अलभ्य सुख की चाह में चीखती रहती थी । उसका वात्सल्य –भग्न पितृत्व अभिशाप बनकर उसे धिक्कारता रहता था; कहता था---- बैजू तुमने अपने जीवन की सारी अभिलाषाएँ, कामनाएँ जिस पर न्योछावर कर दिया, आज वही तुमको अग्निकुंड समझकर खुद से दूर कर दिया । फ़िर भी, मुन्ना का नाम लेते ही तुम्हारी जिह्वा घृणा से नहीं, बल्कि स्नेह से परिपूर्ण दीखती है । बैजू , कुछ उत्तर न देकर शिशु की तरह विलख उठा ।
उसका सिसकना सुनकर बैजू की विकलांग पत्नी, रीवा उसके पास आई और पूछी-----बैजू क्या बात है, तुम रो रहे हो ? आज तुम रोटी लाने भी नहीं गये; क्या हुआ है तुमको ?
बैजू, ज्योतिहीन आँखों से पत्नी की ओर कातर दृष्टि से देखते हुए कहा ---- आज रोटी नहीं मिली । मुन्ना का नौकर , मेरे वहाँ पहुँचने के पहले ही कुत्तों में रोटियाँ बाँट चुका था , इसलिए आज जलाहार ही रहना होगा ।
रीवा, बैजू की बात सुनकर एक क्षण भूमि और आकाश की ओर ताकती रही, फ़िर परास्त होकर बोली---- कोई बात नहीं, हमारे जैसे अभागे दुनिया में और भी हैं । हमें तो एक दिन जलाहार रहना है, कितने तो जन्म से मृत्यु तक जलाहार ही रह जाते हैं ।
पत्नी की बात से लज्जित और पड़ेशान बैजू ने कहा---- तुमने तो हर कदम पर पत्नी-धर्म निभाया, मेरे संग भूखी रही, प्यासी रही, सारी दुनिया का अपमान , और यातनाएँ सही, मगर कभी उफ़ तक नहीं की । लेकिन मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ, जो तुमको जिंदा रहने के लिए पेट भर क्या, एक रोटी भी कुत्ते के मुँह से छीनकर नहीं दे सका । जब जवान था, धनोपार्जन करता था, तब भी तुम्हारे हिस्से का सुख , बच्चों में बाँट दिया करता था ; कहते-कहते बैजू के हृदय में एक करुण चिंता संचार होने लगी । उसकी आँखें भर आईं, फ़िर वहीं पर सलज्ज सिर नीचा कर, आँखें बंद कर ली ।
आँखें बंद करते ही, बैजू की आँखों में मुन्ना का नवनीत चेहरा तैर गया । उसकी सम्पूर्ण चेतना, उसमें मग्न हो गई । उसने देखा----- मुन्ना अपनी छोटी-छोटी उँगलियों से आलू की भाजी उठाकर खाना चाहता है, मगर सब्जियाँ मुँह तक पहुँचने से पहले ही गिर जाती हैं, जिससे परेशान होकर मुन्ना रोने लगता है । तब वह दौड़कर उसे गोद में उठा लेता है और पूछता है----बेटा ! तुम क्यों रहे हो ?
मुन्ना रोता हुआ कहता है ---- ये सब्जियाँ बहुत बुरी हैं, पापा इसे मारो ।
बैजू ,मुन्ना को समझाता है, कहता है ----- बेटा ! ये सब्जियाँ बुरी नहीं हैं, तुम्हारी ये छोटी-छोटी उँगलियाँ अभी कमजोर हैं, इसलिए वो भाजी उठा नहीं सकतीं । जब तुम मेरे इतने बड़े हो जाओगे, तब तुम भी मेरी तरह खा सकोगे । लेकिन बेटा, तब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा , मेरी उँगलियों में तब ये ताकत नहीं रहेगी, कि रोटियाँ तोड़कर मुझे खिला सके; तब तुम मुझे खिलाओगे न ?
मुन्ना छाती से किसी पत्थर के चट्टान की तरह सिमट जाता है , कहता है---- हाँ, खिलाऊँगा ही नहीं, जैसे तुम आज गोद में लेकर बाजार जाते हो, मैं भी तुमको गोद में उठाकर बाजार ले जाऊँगा । तभी सूरज की कड़कती धूप, बैजू के हाड़-मांस से चिपके, शिराओं में बह रही रक्त धाराओं को और लाल बनाने लगी । उसने तड़पकर आँखें खोली, तो देखा---- रीवा, पास बैठी रो रही है ।
बैजू ,अचम्भित हो पूछा---- तुम रो क्यों रही हो ?
रीवा झुँझलाती हुई बोली --- तुम भी तो पुरानी बातों की छाया में बैठकर अपने आराध्य की कठोर छाती पर व्यर्थ आँसू लुढ़का रहे हो । क्यों अपने पुत्र की निष्ठुरता के सहस्त्रों फ़नों की सेज पर अपने दुलार को सुलाना चाह रहे हो ? क्यों तुम उस अलभ्य सुख की कल्पना कर खुद को मिटा रहे हो ?
बैजू ने कहा --- इसलिए कि यही पितृ-धर्म है ।
रीवा गंभीर होकर बोली---- जिस दरवाजे पर कुत्ते जा सकते हैं, रह सकते हैं,रोटियाँ खा सकते हैं वहाँ माता-पिता के ठहरने भर की जगह नहीं ; क्या यही पुत्र-धर्म है ?
बैजू शांत भाव से जवाब दिया---- यह तो अपनी-अपनी सोच है, रीवा । देखो न बाप-दादे ने तो कभी दारू नहीं पिया, मगर उसके लिए तो दारू, जीवन के आवश्यक पदार्थों में से एक है ।
रीवा, पति के निराशा में डूबे हुए शब्द को सुनकर ,आँखों में आँसू लिये, उठकर बड़बड़ाती हुई बाहर चली आई : कही------ उसने तुमको इतना दुत्कारा, घर से निकालकर बाहर फ़ेंक दिया; फ़िर भी उसकी चिंता में दूबे रहते हो और दिखावे को रोते हो । मगर तुम तो आज भी उस पर हृदय के पुष्प और नैवेद्य चढ़ाते हो, जब कि हमारे जीवन की आवश्यकताएँ घटते-घटते एक भिक्षुक की भी सीमा पार कर चुकी हैं ।
बैजू, दार्शनिक गंभीरता से कहा---- रीवा, मैं कोई ओहदेदार नहीं, जागीरदार नहीं, जमींदार नहीं; मेरे जीवन में कोई आनंद नहीं, स्वाद नहीं, मेरे लिए जीवन भार है, और अब इस भार को सिर पर और ढ़ोते रहने की अभिलाषा भी नहीं । इसलिए मेरे पास जो है, वही तो चढ़ाऊँगा ।
रीवा, कुछ उत्तर न देकर, केवल इतना पूछी --- फ़िर उदास जीते क्यों हो ? क्यों नहीं अपने नैराश्य जीवन की खुशी मनाते !
बैजू ,रुखाई से उत्तर देते हुए कहा---- जानती हो रीवा ! कुत्ता पुराने सद्व्यवहारों को याद कर जीवन भर अपने मालिक के साथ आत्मीयता का पालन करता है । शायद यही ख्याल मुन्ना की नजर में एक कुत्ते को माँ-बाप से श्रेष्ठ बना दिया ।
रीवा विरक्त भाव से कही -- सब दिनों का फ़ेर और हाथ की रेखा का खेल । इसमें किसी का कोई दोष नहीं है, इसलिए मैंने जो आज तक कठोर शब्द उसके लिए व्यवहार किये ; मेरे रक्त-मज्जे के बिकने से अगर वह वापस लौट सकता है तो, मुन्ने को खबर भिजवा दो, मैं बिकने के लिए तैयार हूँ ।
पत्नी की बात सुनकर बैजू को वह दिन स्मरण हो आया, जब अपने दोनों प्यारे-प्यारे बच्चों को गोद में लेकर, उन्हें चूमता था । तब उसकी आँखों में कितना अभिमान था , हृदय में कितना उमंग, कितना उत्साह था और आज उन्हीं आँखों में निराशा के आँसू भरे रहते हैं । बैजू ने पृथ्वी की ओर देखकर कातर स्वर में कहा---- हे ईश्वर ! क्या ऐसे पुत्रों को हमारी कोख से जनम दिलाना था ?

 

 

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