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july2015
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तपिश -ए-आफ़ताब से, इतना भी ना--रवीन्द्र गोयल

 

तपिश -ए- आफ़ताब से, इतना भी ना डरा करो,
इलज़ाम खुद तुम पर है, धरती पर ना धरा करो ।

 

 

जलो और उड़ते चलो, देखो कि गगन मुंतज़िर है,

जुगनुओं की माफ़िक, महज़ रात में ना उड़ा करो ।

 

 

फिर नया ख़्वाब देखो, ख़्वाब से नज़ारे बदलते हैं,

ज़िक्र है परवाज़-ए-ग़ैर का, तुम ग़ौर ना करा करो ।

 

 

अरमान हैं पतंगों जैसे, जले अगन तो निकलते हैं,

कुछ जले शमा-ए-रूह, लाड़ उन का ना करा करो ।

 

 

महताब रोशन हुआ है, किसी आफ़ताब के नूर से,

रोशन हो तुमसे जहां, तुम आफ़ताब सा जला करो ।

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

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