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july2015
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तुलसी ने मानस रचा, दिखी--- अमन चाँदपुरी

 

तुलसी ने मानस रचा, दिखी राम की पीर।
बीजक की हर पंक्ति में, जीवित हुआ कबीर।।

 

 

माँ के छोटे शब्द का, अर्थ बड़ा अनमोल।
कौन चुका पाया भला, ममता का है मोल।।

 

 

भक्ति,नीति अरु रीति, की विमल त्रिवेणी होय।
कालजयी मानस सरिख , ग्रंथ न दूजा कोय।।

 

 

इस झूठे संसार में, नहीं सत्य का मोल।
वानर क्या समझे रतन, है कितना अनमोल।।

 

 

जिनको निज अपराध का, कभी न हो आभास।
उनका होता जगत में , पग-पग पर उपहास।।

 

 

जंगल-जंगल फिर रहे, साधू-संत महान।
ईश्वर के दरबार के, मालिक क्यों शैतान।।

 

 

जब से परदेशी हुए, दिखे न फिर इक बार।
होली-ईद वहीं मनी, वहीं बसा घर द्वार।।

 

 

झूठों के संसार में, नहीं सत्य का मोल।
सिक्कों के बदले यहाँ, मिलते झूठे बोल।।

 

 

डूब गई सारी फसल, उबर न सका किसान।
बोझ तले दबकर अमन , निकल रही है जान।।

 

 

निद्रा लें फुटपाथ पर, जो आवास विहीन।
चिर निद्रा देने उन्हें, आते कृपा-प्रवीण।।

 

 

 

--- अमन चाँदपुरी

 

 

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