ONLINE HINDI MAGAZINE
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सम्पादकीय

 

                 भाषा उन सर्वोत्तम सृष्टियों में एक है , जिसका मानवता के विकास में अनिवार्य योगदान है । प्रकृति की प्रबल शक्तियों से निर्भय होकर टकराते हुए उन्हें अपने अनुकूल बना लेने के सामर्थ्य को पाने के लिए मानव को संगठित रूप में बाँधने का माध्यम है , भाषा ! कोई भी भाषा, किसी अन्य भाषा से छोटा या बड़ा नहीं होता,लेकिन जिस भाषा का अधिकांश लोग बोल-चाल में व्यवहार करते हैं, उसकी महत्ता अन्य भाषाओं से अधिक हो जाती है; जैसे हिन्दी । आज हिन्दी विश्व के कोने-कोने में पहुँच चुकी है । दूसरे भाषाई के लोग ,इसे सीखने और बोलने में अपने को गर्वित महसूस करते हैं ; लेकिन दुख की बात है कि हिन्दी अपने ही घर में अवहेलना का शिकार हो गई है । तर्क में ,प्रस्तुत करते हैं कि हिन्दी अभी इतनी समर्थ नहीं कि प्रशासन का बोझ उठा सके । यह कहते हुए वे भूल जाते हैं, कि भाषा को महज अनुवाद और दफ़्तरों में बैठकर समृद्ध नहीं बनाया जा सकता ।

                हिन्दी में जीवन-साहस और ओज सब कुछ है; बावजूद अंग्रेजी की मानसिक दास्तां में उलझे लोग इस तथ्य को समझने के लिए तैयार नहीं हैं । ऐसे भी, हिन्दी के प्रचार –प्रसार का काम केवल सरकार के बूते संभव नहीं है ; इसके लिए जन-जन को आगे आना होगा । हिन्दी को जितना अधिक हम अपने जीवन में जगह देंगे, हिन्दी उतनी ही फ़लेगी, फ़ूलेगी ।

                खुशी की बात है कि भारत में बहुत ऐसी सस्थाएँ हैं जो अपनी पत्रिका हिन्दी में निकालकर हिन्दी को आगे लाने की कोशिश कर रही है । इनमें एक स्वर्गविभा ( www.swargvibha.in ) भी अपना नाम दाखिल कराने में संभव हो सकी है । www.swargvibha.in  वर्ष में दो बार ऑन लाइन प्रतियोगिता रखती है ; जिनमें रचनाकारों की रचनाओं को नि:शुल्क प्रकाशित कर उनमें से सर्वोत्तम रचनाओं में से किन्हीं दो को पुरस्कृत कर, उनके मनोबल को और बढ़ाने की कोशिश करती है । इसके अलावे भी स्वर्गविभा राष्ट्रीय तारा सम्मान,जिसके अंतर्गत 2008 से देश-विदेश के प्रतिभागियों में से किहीं पाँच को चयनित कर 2100/- और  प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित करती है । इस तरह स्वर्गविभा हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यथासंभव प्रयत्नशील है । आगे भी आपलोगों का विचार, स्नेह और सहयोग इसी तरह मिलता रहा, तो स्वर्गविभा निर्विघ्न हिन्दी की सेवा करती रहेगी ।

 

                                         डॉ० श्रीमती तारा सिंह

                                       प्रधान सम्पादक, स्वर्गविभा

 

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