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कॉमा में है रेलवे, जरूरी है इलाज

 

 

एम. वाई. सिद्दीकी
पूर्व सूचना निदेशक विधि व न्याय और रेल मंत्रालय, भारत सरकार

अंग्रेजी से अनुवाद: शशिकान्त सुशांत, पत्रकार

 

 


हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के सरकार से जाने के बाद रेलवे महकमा कांग्रेस के जिम्मे आया है। पिछले 8 सालों से सरकार चला रही कांगे्रेस की मजबूरी थी कि वह अपने सहयोगियों को उनके मन का मंत्रालय देकर संतुष्ट करे और सरकार को बचाने का काम करती रहे। सही मायने में देखा जाए तो गठबंधन सरकारों के दौर में रेल मंत्रालय हमेशा राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। एनडीए सरकार में भी भाजपा की सहयोगी रहीं पहले ममता बनर्जी ने यह महकमा लिया बाद में अलग होने पर जनता दल यूनाइटेड ने इस पर कब्जा कर लिया। यूपीए-2 में ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ थी जाहिर है उन्हें रेल मंत्रालय से कम पर किसी तरह संतुष्ट करना आसान नहीं है। ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहते एनडीए शासन में भी रेलवे को कॉमा में पहुंचने से बाद में रेलमंत्री बने नीतीश कुमार ने बचाया था। बाद में देश की प्रगति के साथ रेलवे ने अच्छी खासी कमाई की और स्थिति बेहतर हुई। 2009 में रेल मंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने रेलवे और उसके बजट का दुरूपयोग अपने को बंगाल की सत्ता में स्थापित करने के लिए किया। रेलवे की वर्तमान दशा को देखते हुए रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने सफाई दी है कि रेलवे आईसीयू में नहीं बल्कि कॉमा में है। चलिए यदि रेलमंत्री की ही बात मान लिया जाए तो रेलवे की दशा ऐसी हो गई है कि इसे जल्द से जल्द आईसीयू में भर्ती कराना पड़ सकता है, यदि समय रहते इसका गैर राजनीतिक इलाज नहीं किया गया।
२०१२-१३ का बजट पेश करते हुए तत्कालीन रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने रेलवे की माली हालत को देखते हुए जो उपाय किए वह उनके मंत्री पद के लिए ही दुश्मन बन गया और उन्हें इसके जुर्म में हटा दिया गया। श्री त्रिवेदी ने रेलवे में सुधार के लिए तीन महत्वपूर्ण उपायों का उल्लेख करते हुए कहा था कि आर्थिक, सुरक्षा व संरक्षा के साथ किराया बढ़ोतरी को अमली जामा पहनाना समय की जरूररत है। बजट आने से पूर्व ही रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए बनाई गई दो समितियों की रिपोर्ट भी आ चुकी थीं। पहली समिति रेलवे में सुरक्षा, परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में गठित की गई थी जबकि आधुनिकीकरण के लिए तकनीकी विशेषज्ञ सैम पित्रोदा की अध्यक्षता में गठित की गई थी। दोनों ही समितियों ने रेलवे में आमूल चूल सुधार के लिए ६६०,००० करोड़ रूपये के एकमुश्म राहत पैकेज की संतुति की थी जिसे १२वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान पूरा करने हैं।
जहां एक ओर रेलवे की माली हालत और पतली होती जा रही है वहीं दूसरी ओर सरकारी निवेश घटता जा रहा है। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में रेलवे को अपनी कमाई बढ़ाने के लिए निवेश की राशि में जबर्दस्त बढ़ोतरी करनी पड़ेगी। इसे देखते हुए अनिल काकोदकर कमेटी ने रेलवे की सुरक्षा एवं संरक्षा पर अगले पांच सालों में १००,००० करोड़ रूपये निवेश की आवश्यकता पर बल दिया है जबकि सैम पित्रोदा की कमेटी ने रेलवे को अपने खर्च को कम करने के लिए अगले पांच सालों में ५६०,००० करोड़ रूपये के निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया है। इस राशि निवेश के बाद रेलवे की खत्म होते ट्रैक, रौलिंग, डीजल और इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव का आधुनिकीकरण, सिग्रल सिस्टम में सुधार के साथ उसके आर्थिक स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए यह निवेश करने होंगे। लेकिन विडंबना यह है कि 31 मार्च २०१२ तक रेलवे के पास मात्र ५२५८ करोड़ की राशि ही अधिशेष बचती है। इस राशि से कुछ होने वाला नहीं है।
६६०,००० करोड़ निवेश के अलावा रेलवे को डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर में निवेश करके रेलवे के बाहरी आर्थिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाना होगा। यह पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशिप पर आधारित है। इस योजना को संचालित करने के लिए रेलवे ने जापान और वल्र्ड बैंक के साथ करार किया है। निवेश की यह राशि बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान पूरी करनी है। यह योजना रेलवे में सुरक्षा और संरक्षा को और ज्यादा मजबूती प्रदान करेगा और आधुनिकीकरण के लिए किये जा रहे प्रयासों को अमली जामा पहनाएगा। यदि यह योजना अमल में आ जाती हैं तो आने वाले पांच वर्षों में रेलवे की माली वित्तीय हालत में आमूलचूल सुधार होने की संभावना है।
अब मूल प्रश्र यह खड़ा होता है कि इतनी बड़ी राशि कहां से आएगी? उदारीकृत भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से बढ़ी माल और यात्री सेवा की मांग के आगे रेलवे को यह प्रतिपूर्ति करनी होगी। वर्तमान समय में रेलवे की माल ढुलाई की रफ्तार १५-२० प्रतिशत की दर से बढ़ रही है जिसे पूरा करने के लिए रेलवे को अपनी क्षमता में वृद्धि करनी होगी। एक ओर रेलवे पर यात्री सेवा का भार बढ़ रहा है तो दूसरी ओर माल ढुलाई के लिए रेलवे रैक की मांग भी बढ़ रही है। उम्ीद है कि यदि रेलवे इस विकास गति को साध ले तो इसकी सालाना आय १०,००० करोड़ रूपये तक बढ़ सकती है। दूसरी ओर यदि यात्री किराये में थोड़ी सी वृद्धि कर दी जाए तो उससे सालाना २०००-२५०० करोड़ की अतिरिक्त आय होनी तय है। कुल मिलाकर रेलवे के लिए अब समय की जरूरत है कि इसे राजनीति की चाशनी में लपेटकर बर्बाद होने से बचाया जाए। ममता बनर्जी ने इसे अपनी बंगाल की राजनीति साधने के लिए जिस तरह से उपयोग किया है उसने तो रेलवे को और दुर्दशा का शिकार बना दिया है। यात्री किराया को बिना छुए हुए अतिआवश्यक वस्तुओं की ढुलाई पर २५ प्रतिशत तक बढ़ोतरी करके ममता बनर्जी की पार्टी ने आखिकार आम जनता पर ही तो बोझ डाला था लेकिन उसे यह समझ में नहीं आता कि यदि माल भाड़ा को तर्कसंगत रखते हुए यात्री किराये में भी थोड़ी बहुत बढ़ोतरी कर दी जाए तो समग्र रूप से रेलवे की हालत सुधारने में आसानी होगी लेकिन राजनीतिक हथियार बन चुकी रेलवे को उबारने के लिए अंतत: उसे आईसीयू में भेजने की ही नौबत आ सकती है। जाहिर है रेलवे के लिए कोयला, लोहा, खाद, चावल, गेहूु, तैयार स्टील ऐसे स्थाई माल ढुलाई के स्त्रोत हैं जिसके चलते रेलवे को अपनी कुल माल ढुलाई का ७० फीसदी से ज्यादा आय होती है। यदि इसी की ढुलाई में वृद्धि कर दी जाए तो बाजार में इसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ता है।
अंतत: रेलवे के समक्ष एकमात्र रास्ता यही बचता है कि वह या तो भारत सरकार से बजटीय सहायता प्राप्त कर इन योजनाओं में जान डाले या फिर अपने सबसे बड़े आर्थिक हथियार रेलवे वित्त निगम को यह अधिकार दे कि वह ज्यादा से ज्यादा पूंजी बाजार से उधार लेकर इन योजनाओं को पूर्ण करने में अपनी महती भूमिका अदा करे। यदि रेलवे अपनी क्रास सब्सिडी हथियार माल भाड़ा आय को यात्री किराया में खपाती रही तो इसके लिए गंभीर वित्तीय संकट खड़े होने की संभावना है। रेलवे को सामाजिक जिम्मेदारी के तहत सालाना १३,००० करोड़ रूपये खर्च करने पड़ते हैं। रेलवे के लिए खुशखबर यह रही कि इस दौरान रेलवे का माल ढुलाई की दर १०.२ प्रतिशत की दर से बढ़ रही है तो दूसरी ओर यात्रियों की संख्या भी ९.५७ प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इस बढ़ोतरी का फायदा रेलवे को तभी मिल सकेगा जब रेलवे उसे गंतव्य तक समय से पहुंचा सके। देश की प्रगति के साथ ही रेलवे का विकास होगा न कि अकेले। रेलवे का अधिकारिक आंकड़ा बताता है कि पिछले साल रेलवे को माला भाड़े से ५६,३९४.२३ करोड़ रूपये ज्यादा की आय हुई है जबकि यात्री किराया २५,८५८ करोड़ तक पहुंच चुका है। पार्सल लगेज आदि से रेलवे को २५८० करेाड़ की आय हुई है। कुल मिलकार रेलवे को कुल बजटीय आकलन ८४,४०२.३४ करोड़ की तुलना में ९२,९८५.५० करोड़ की आय हुई है। यह पिछले साल की तुलना में १० प्रतिशत की बढ़ोतरी का सूचक है।
आज की तारीख में रेलवे के समक्ष सबसे बड़ा लक्ष्य यह है कि वह देश के चार बड़े महानगरों के १९,००० किलोमीटर घने ट्रैक को सुधारे, उन्नयन करे और उसका विस्तार भी करे क्योंकि यह रेलवे के कुल ६४,००० किलोमीटर ट्रेक का ८० फीसदी रेल ट्रैफिक इसके हिस्से ही आता है। इस ट्रै्र्रक पर कुल ११,२५० रेल पुल हैं जो कि कुल रेल पुलों की संख्या १२८,००० का नब्बे फीसदी तक हैं। हाईस्पीड ट्रेन चलाने के लिए इस ट्रैक और इस पर स्थित पुलों की मजबूती बहुत जरूरी है।
यदि रेलवे की आय इसके बजटीय आकलन से दस फीसदी ज्यादा हो जाए तो यह अपने सभी समस्याओं का निदान करने में सक्षम हो सकती है। यदि रेलवे के आंतरिक व्यय को कम करके इसे और ज्यादा बिजनेस दृष्टि से चलाया जाए तो संभव है कि आने वाले दिनों में यह देश के लिए एक अनुकरणीय टूल बन जाए। इससे खुद रेलवे की तो हालत सुधरेगी ही इसे एअर इंडिया बनने से रोका जा सकेगा। एअर इंडिया को जब प्राइवेट एअरलाइनों से सख्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है तो इसे अपनी वित्तीय हालत को सुधारने के लिए सरकार की ओर मुंह ताकने की नौबत आ खड़ी होती है। रेलवे के साथ यह नहीं है क्योंकि इसका कोई प्रतिस्पर्धी है ही नहीं और भारत सरकार यदि चाहे तो इसमें ज्यादा निवेश बढ़ाकर इसकी हालत को सुधार सकती है और यह देश की नाड़ी तंत्र देश के विकास को नई दिशा देने में सक्षम हो सकेगी।
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