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राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की विफलता फंड लूट का नतीजा

 

 

एम. वाई. सिद्दीकी
पूर्व सूचना निदेशक विधि व न्याय और रेल मंत्रालय, भारत सरकार

अंग्रेजी से अनुवाद: शशिकान्त सुशांत, पत्रकार

 

 

 


भारत सरकार का सबसे प्रमुख और आम आदमी के नाम पर खूब प्रचारित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की विफलता ने कई ऐसे अन्य फ्लैगशिप योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कहना न होगा कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की विफलता ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिसका जवाब समय रहते मिलना मुश्किल लग रहा है। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना की समाप्ति के बाद किए गए कागजी छानबीन के बाद यह बात सामने आई है कि मार्च २०१२ तक इस योजना के तहत आवंटित विभिन्न राज्यों के लिए राशि में से ५५०० करेाड़ खर्च ही नहीं हो पाए हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के लिए इस महत्वाकांक्षी योजना को बंद करने के सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं था। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की विफलता का ठीकरा केवल एक राज्य के सिर पर नहीं फोड़ा जा सकता क्योंकि इस हेराफेरी के धंधे में सभी राज्यों की बराबर की भागीदारी दिखती है। जब भारत सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस योजना के क्रियान्वयन से संबंधित उपयोगिता प्रमाण पत्र की मांग सख्ती से करनी शुरू कर दी तो सभी राज्य सरकारों की ओर से बेरूखी के संकेत मिलने शुरू हो गए। शायद यही बड़ा कारण रहा हो जिस कारण इस योजना को बंद करने के लिए केंद्र सरकार ने हामी भर दी। हमारे संविधान में स्वास्थ्य का मामला राज्य सरकार के अधीन आता है, इस मामले में केंद्र सरकार राज्यों को केवल धन मुहैया कराने के अलावा सुविधाएं दे सकती हैं, उसके क्रियान्वयन और उपयोगिता की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के ऊपर होती है, ऐसे में राज्य सरकारें केंद्र से मिले धन का सदुपयोग करे या न करें उसके विचाराधीन होता है। राज्य सरकारों पर केंद्र सख्ती के नाम पर उपयोगिता प्रमाण पत्र मांग सकता है या अंतत: कार्यक्रम बंद करने को मजबूर हो सकता है। एक निश्चित समय सीमा में किसी भी केंद्रीय मिशन का क्रियान्वयन नहीं होने पर केंद्र सरकार के हाथ बंधे हुए हैं।
केंद्र सरकार के परिवार एवं कल्याण मंत्रालय के खबरों के अनुसार केंद्र की कोशिश है कि वह राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक निश्चित समय सीमा बनाए जिसके तहत केंदी्रय स्वास्थ्य योजनाओं को समय पर पूरा किया जा सके और इसके लिए एक दक्ष एवं जिम्मेदार अधिकारी की नियुक्ति भी की जाए जो इन योजनाओं के राजकोषीय बेहतर इस्तेमाल पर नजर रखे। इससे संबंधित योजना के समय पर पूरा होने की संभावना बढ़ जाएगी और केंद्र की राशि के सदुपयोग का प्रमाण पत्र भी समय से मिल जाएगा। अभी तक देखने में यह आता है कि राज्य सरकारें उपयोगिता प्रमाण पत्र देने में ही सालों की लेटलतीफी कर डालती है और केंद्र सरकार कुछ नहीं कर पाती। केंद्र की सख्ती पर राज्य सरकारें नाराज भी होती हैं। केंद्र सरकार की चाहत होती है कि उसके द्वारा पोषित योजनाओं को राज्य सरकारें समय पर पूरा करें और जमीनी धरातल पर उसका असर दिखे।
भारत सरकार के आफिशियल बोलचाल में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम को किले में भ्रष्टाचार की दीवार के नाम से अंदरूनी रूप से कहा जाने लगा है। क्योंकि सभी राज्यों में मिलने वाली धन हस्तांतरण की शिकायतें और कार्यक्रम के पूर्णता में हजारों छिद्रों के कारण इसकी साख बहुत ज्यादा गिर चुकी है। यह भी कहा जाने लगा है कि जिस तरह इस कार्यक्रम में धांधलियां सामने आई हैं उससे लगता है कि केंद्र सरकार इस कार्यक्रम का संचालन राज्यों को धांध्ािलयां करने के लिए कर रही है और धन का भकी इंतजाम कर रही है। उत्तर प्रदेश में हजारों करोड़ के एनएचआरएम घोटाला तो एक संकेत है, जिसका भंडाफोड़ हुआ है, सभी राज्यों में इस मिशन का यही हाल है, बस अंतर है तो खुलासे का। इस कार्यक्रम को राष्ट्रहित और जनहित के लिए पूरी तरह लागू नहीं कर पाने में सभी राज्य सरकारों की बराबर की सहभागिता है। कहना न होगा कि इस योजना की विफलता की कहानी सभी राज्यों में एक जैसी ही है। उदाहरण के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश को लिया जा सकता है, जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है और सैंकड़ो लोगों की जानें दवा और डाक्टर के अभाव में चली जाती हैं। जहां बिहार में एनएचआरएम योजना के तहत मिली राशि को ५२६३ उपकेंद्रों, ६२५ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और ५५२ सीएचसी तक यह योजना नहीं पहुंच पाई तो उत्तर प्रदेश में ५८२३ उपकेंद्रों, ६९८ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और ५८२ सीएचसी तक यह योजना नहीं पहुंच सकी। यह दोनों राज्य सरकारों को मिले लक्ष्य का ३० से ४० फीसदी तक की उपलब्धि के रूप में कैसे गिना जाए यह कहना मुश्किल है। कहां केंद्र सरकार एनएचआरएम के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा को गांव-गांव, घर-घर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित करती है तो राज्य सरकारें उसमें पलीता कैसे लगाती हैं यह दोनों राज्यों के आंकड़ों को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। हिन्दी क्षेत्र के ये दोनों ही राज्य विकास के मापदंड के अलावा मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में अभी तक बहुत ही पीछे चल रहे हैं।
यदि आपको राज्य सरकारों के कार्यों की छानबीन करनी हो तो आप उत्तर प्रदेश को उदाहरण के तौर पर रखकर परख सकते हैं जहां एनएचआरएम योजना के तहत राज्य के १२९ जिला अस्पतालों के उन्नयन और सुधार का काम मार्च २०१२ तक पूरा ं हो जाना चाहिए था लेकिर इसमें कोई भी कार्य पूरा नहीं हो पाया है। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि किसी केंद्र की स्वास्थ्य सुविधा को यूनिवर्सल स्तर पर लाने के लिए सबसे पहले उस अस्पताल का उन्नयन पहली शर्त होती है जब यही कार्य राज्य सरकारें समय सीमा में नहीं करा पाईं तो आगे की व्यवस्था की कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं। कहना न होगा कि जब तक राज्य सरकारें जनहित और जनस्वास्थ्य की महता को देखते हुए योजनाओं को अमली जामा नहीं पहनाएंगी केंद्र की सहायता का कोई प्रभाव सामने नहीं आ सकता। एनएचआरएम योजना की विफलता की दूसरी दास्तान यह है कि इस पैसे का उपयोग करते हुए राज्य सरकारों ने ठेके पर डाक्टरों की भर्ती कर ली और तो और विशेषज्ञ डाक्टरो की बहाली के लिए बने नियमों में भी ढिलाई बरती गई। बिना संस्थागत ढांचा विकसित किए कोई भी कार्य पूर्ण कैसे हो सकता है? यही वे कारण है जो हमारी योजनाओं के धरती पर नहीं पहुंचने का कारण बनते हैं और पैसा रहते हुए काम नहीं होने के कारण लोगों को असुविधाएं झेलने को मजबूर होना पड़ता है।
अनंत और अंतहीन कार्यक्रमों की दुखदायी विदाई का सिलसिला एनएचआरएम योजना में बखूबी देखने को मिली है। देश को विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के मकसद से १९८५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सबको स्वास्थ्य सुविधा नामक योजना की शुरूआत की थी जिसके लिए सन २००० अंतिम लक्ष्य वर्ष के रूप में दर्ज था लेकिन वह योजना भी खटाई में पड़ी रही। बारहवीं पचवर्षीय योजना के दूसरे चरण में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की दश दिशा देखकर यही कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार केवल योजना बना सकती है इसके कार्यान्वयन का इंतजाम नहीं। ऐसे में कई योजनाएं दुर्गति का शिकार होंगी और बनती रहेंगी।
इसे छोडि़ए अन्य योजनाओं का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है बल्कि बुरा ही है। रोगी कल्याण समिति, आशा, मोबाइल मेडिकल यूनिट आदि योजनाएं ठंडे बस्ते में पड़ी हुई हैं। जहां तक लोगों के स्वास्थ्य संबंधी प्रतिरक्षण कार्यक्रमों का सवाल है बिहार जैसे घनी आबादी वाले राज्य में उतनी संख्या में स्वास्थ्य केंद्र या उपस्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं जहां लोगों की स्वास्थ्य की जांच की जा सके। राज्य सरकार इस तरह कोई तंत्र या चेन विकसित नहीं कर पाई है जहां लोगों के रूटीन स्वास्थ्य की जांच भी की जा सके। केंद्र शासित प्रदेश दादर एवं नगर हवेली, दमन एवं दीव और दिल्ली ने इस तरह का तंत्र विकसित कर लिया है जहां लोगों को नियमित स्वास्थ्य जांच की जा सके। इसके अलावा अन्य जनहितकारी कार्यक्रमों की दशा बुरी है जिसमें जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम जैसे महत्वपूर्ण योजनाएं शामिल हैं। यह भयावह दृश्य है जिसकी बानगी आप बिहार और उत्तर प्रदेश के गांवों में देख सकते हैं। कार्यरत सरकारी अस्पतालों की हालत यह है कि वहां से मिलने वाले आंकड़ें फर्जी और बकवास होते हैं। क्योंकि बहुत सारे मामलों में यह देखा जाता है कि प्रसव के लिए लाई गई महिला अस्पताल के बाहर ही बच्चे को जन्म दे चुकी है लेकिन उसे अस्पताल में प्रसव कराया हुआ दिखाया जाता है। इस तरह के कई अन्य केस हैं जिसमें इन स्वास्थ्य केंद्रों की कर्तव्यपरायणता की कलई खोलते हैं। भारत सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम की शुरूआत इसलिए की थी ताकि पहले चरण में असाध्य रोगों पर काबू पाया जा सके जैसे राष्ट्रीय कालाजार उन्मूलन कार्यक्रम या इससे जनित रोग, खसरा, मलेरिया, जापानी बुखार, टीबी रोकथाम कार्यक्रम, कुष्ठ रोग निवराण कार्यक्रम, मोतियाङ्क्षबद और अंधता निवारण कार्यक्रम, आयोडिन अल्पता सुधार कार्यक्रम के अलावा समग्र स्वास्थ्य संरक्षा निगरानी प्रोग्राम शामिल हैं।
अब वह समय आ गया है कि राज्य सरकारें बीती ताहि बिसार दें आगे की सुध ले के तर्ज पर चलते हुए कें्रदीय स्वास्थ्य योजना को ईमानीदारी से अमली जामा पहनाएं और केंद्र राज्य संबंधों के दलदल से बाहर निकलें। इससे देश और समाज को लाभ होगा। एनएचआरएम को जमीनी स्तर पर क्रियान्वित करने का बड़ा लाभ आम आदमी जिसमें ज्यादातर गरीब लोग आते हैं को होगा, ऐसे में जरूरी है कि राज्य सरकारें कोष अवशोषित नीति को त्यागें और जनहित में फैसला लेते हुए कम से कम स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं को धरती पर उतारने में सहयोग दें। इसका लाभ उसके राज्य को पहले मिलेगा, केंद्रीय सरकार को राजनीतिक लाभ बाद में। राज्य और केंद्र संबंधों की व्याख्या कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में नहीं होना चाहिए।
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