tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






 

 

कही खुशी कही ग़म

 

 

जिस दिन का बेसबरी से इंतजार था, आखिर वो दिन आ ही गया। ये दिन किसी के लिए खुशी तो किसी के लिए ग़म के आसूं लेकर आया है। जो सफल हुए वो तो अपनी खुशी का इजहार पटाखों और ढ़ोल नगाड़ों के साथ कर रहे है। जिन्हें सफलता हाथ नही लगी है। वो सोच में पड़े होगें की आखिर मेहनत में कहा कसर रह गई है। इस खुशी और गम का जिक्र मैनें दो राज्य जम्मू कश्मीर और झारखण्ड के विधानसभा चुनाव के नतीजे को देखते हुए किया है। पांच चरण में हुए इन चुनावों में सभी उम्मीदवार को अपने नतीजों को जानने का इंतजार 23 दिसम्बर की सुबह खत्म हो गया। आज सुबह से वोटों की गिनती जब शुरू हो गई। सभी उम्मीदवार वो चाहे बीजेपी के हो या कांग्रेस य फिर किसी अन्य दल के अपनी तेज धड़कनों के साथ मतगणना केंद्र या फिर टीवी के सामने अपनी नज़रों को जमा कर रखी थी। हर पल की ताजा जानकारी की किसे कितनी सीटे मिल रही है। कौन आगे निकल रहा है। कौन हार रहा है। कौन जीत रहा है। राजनीतिक पार्टी के नेताओं साथ –साथ उसके कार्यकर्ता भी इस पूरे वाक्ये को बड़ी स्थिरता के साथ देख रहे थे। पटाखों की गूंज पार्टी कार्यालय पर हर तरफ सुनाई पड़ रही थी। हारने वाले दल के उम्मीदवारों के मन में यही बात आ रही थी, कि हे भगवान मैने क्या गलती की है। इन विधानसभा चुनाव में जहां बीजेपी ने अपने जलवे फिर से बिखेरे, वही कांग्रेस के हाथ निराशा ही लगी। कही लड्डू बटें तो कही गम़ का अंधियारा पसरा। झारखण्ड में बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आगे आई, तो जम्मू कश्मीर में पीडीपी ने बाजी मारी। क्षेत्रीय दलों के बड़े-बड़े दिग्गजों को हार का सामना करना पड़ा। जो हारे उनके परिवार, रिश्तेदार दोस्त यार को बड़ा सदमा लगा। आखिर सत्ता का रूतबा ही कुछ ऐसा है। कुछ प्रत्याशी के आखों में आंसू भी देखने को मिले। जिन प्रत्याशियों ने जीत हासिल की उनके यार दोस्त और रिश्तेदारों के यहां भी मिठाइयों का भण्डारा शुरू हो गया। टेलीविजन पर नज़र पड़ते ही बस यही दिखता था। फूलों की बौछार हो रही है। कार्यकर्ता खुशियों से झूम रहे हैं। इस खुशियों का लाभ सबसे ज्यादा बीजेपी को मिला। ऐसा लग रहा है देश में अभी भी मोदी की लहर कायम है। बीजेपी कश्मीर में भले ही दूसरे नम्बर पर है। पर कश्मीर में सीटों पर अपनी बढ़ोत्तरी तो बढा लिया। बस मोदी कि एक बात मिशन 44 पीछे हट गया। अब तो ज़नता ने अपने नेताओं के भविष्य का फैसला कर ही दिया है। अब फिर से पांच सालों की पढ़ाई इन नेताओं की शुरू होगी। जो जीते उनके लिए भी, जो हारे उनके लिए भी। खैर मैदान में तो हार जीत लगी रहती है। इतना निराश होने की जरूरत नही है। कहा जाता है -गिरते हैं शह सवार ही मैदान ऐ जंग में, वो तिफल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले।
पर इस सच्चाई से भी मुंह नही मोड़ा जा सकता है। कि चुनाव के नतीजे ने तो कही ग़म तो कहीं खुशी का माहौल बना दिया है।

 

 


रवि श्रीवास्तव

 

 

HTML Comment Box is loading comments...