tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






 

सांप्रदायिक हिंसा के ‘अर्थशास्त्र’ पर बहस क्यों न हो

 

 

उत्तर प्रदेश सरकार ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पर राष्ट्रीय
मानवाधिकार आयोग के समक्ष कहा है कि मुजफ्फरनगर को इसलिए चुना गया
क्योंकि वहां के मुसलमान गरीब वर्ग के थे और ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे।
सांप्रदायिक हिंसा के इस ‘अर्थशास्त्र’ को विचित्र सिद्धांत कहते हुए,
चिंतन-मनन न करके सांप्रदायिक घटनाओं को रोकने की नसीहत देते हुए कहा गया
कि विफल सरकार इन घटनाओं को रोकने से ज्यादा इनकी विवेचना और विश्लेषण कर
रही है। बेशक, 2013 में पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा की 823 वारदातों
में अकेले उत्तर प्रदेश में 247 वारदातें हुई। इसी साल के सात महीने में
तकरीबन 65 घटनाएं हो चुकी हंै। पर इसका यह मतलब नहीं है कि इस पर
चिंतत-मनन न किया जाए, क्योंकि समाज में घटित किसी घटना के पीछे की
वैचारिक प्रक्रिया को समझना नितांत जरुरी है, वह भी सांप्रदायिक हिंसा
में तो बेहद जरुरी हो जाता है।

मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा को देख उस वक्त हर कोई यही कहता कि इतनी
बड़ी त्रासदी कैसे घटित हो गई? सांप्रदायिक हिंसा जिसका केन्द्र बिंदु
कस्बाई-शहरी क्षेत्र हुआ करते थे, पर जिस तरह से मेल-जोल वाली ग्रामीण
संस्कृति में यह भड़की, ऐसे में खापों वाले इस इलाके के वर्गीय चरित्र को
समझना नितांत जरुरी होगा। लाक, लिसाड़, फुगाना, कुटबा, कुटबी, बहावड़ी
समेत ऐसे दस से अधिक गांव जहां सितंबर 2013 में हुई सांप्रदायिक हिंसा के
बाद पूरे के पूरे गांव के मुस्लिम परिवार पूर्ण रुप से विस्थापित हो चुके
हैं, इसमें ज्यादातर रंगरेज, धोबी, लोहार, जुलाहा ऐसी निचली श्रमिक
जातियों के लोग हैं, जिनकी खेती-किसानी में मजदूर की हैसियत है। वहीं पास
के बुढ़ाना, जौला, कांधला, कैराना व उनके आस पास के गांव जहां जाट
मुस्लिम और गुर्जर मुस्लिमों का बाहुल्य था वहां सांप्रदायिक हिंसा नहीं
हुई, बल्कि इन्हीं क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा से पीडि़त मुसलमानों
को आसरा प्रदान किया गया। इनकी समृद्धि का आकलन इस बात से लगाया जा सकता
है कि शुरु में हफ्तों तक राहत कैंपों ने कोई सरकारी सहायता नहीं ली।
प्रदेश सरकार द्वारा राहत कैंपों को कागज में खत्म कर देने के बाद, आज भी
इस इलाके के सम्पन्न मुसलमान पीडि़त परिवारों को राशन की व्यवस्था कर रहे
हैं तो कहीं-कहीं पर राहत कैंप भी चला रहे हैं।

इस अर्थशास्त्र के तहत शिकार सिर्फ मुजफ्फरनगर ही नहीं बल्कि आस-पास के
जिलों के ग्रामीण क्षेत्र भी हुए। मसलन, आठ सितंबर को सांप्रदायिक हिंसा
से बचने के लिए बागपत जिले के अंछाड़ गांव़ के सभी मुस्लिम परिवार गांव
छोड़कर भाग गए। आमिर को अपने घर की चिंता सता रही थी। जब वह 12 सितंबर को
गांव गया तो सांप्रदायिक तत्वों ने उसको मारकर घर में छत से उसके शव को
टांग दिया। जब आमिर का परिवार उसे ढूंढ़ते हुए गांव पहुंचा तो कहा गया कि
इसको जल्दी दफनाओ नहीं तो हम इसे जला देंगे, और बिना गुस्ल के उसे
इस्लामिक मान्यता के विरुद्ध उत्तर-दक्षिण दिशा में दफना दिया गया। उसके
पिता रईसुद्दीन, मां और पत्नी को बंधक बना लिया गया और कहा गया कि आमिर
ने अस्सी हजार रुपए लिए थे, अगर रुपए नहीं लौटाओगे तो उसकी पत्नी को रख
लेंगे और उसके पिता-माता से गोबर पानी करवाएंगे। अन्ततः 30 सितंबर को रकम
अदा करने के बाद वे वहां से मुक्त हो पाए। इसके बाद तमाम शिकायतों के बाद
आज तक इंसाफ की गुंजाइस नहीं बनी। सांप्रदायिक हिंसा के दौरान हत्या किए
गए शव का पोस्टमार्टम तक नहीं हो सका। इसी तरह की कहानी डूगर के मेहरदीन
की भी है, जिसे मारकर छत से टांग दिया गया था। रिहाई मंच की तहरीर पर
मुकदमा तो पंजीकृत हुआ और शव निकालकर पोस्टमार्टम कराने की तैयारी भी हुई
पर गांव वालों के दबाव के चलते पोस्टमार्टम नहीं हो पाया। इंसाफ के ऐसे
बहुतेरे सवाल सामंती सांप्रदायिक वर्चस्व की जमीन में आज भी दफ्न हैं।

बहरहाल, आमिर के सहारे इस क्षेत्र की सामाजिक संरचना को समझने की कोशिश
की जा सकती है। इस क्षेत्र में आज भी बधुंआ मजदूरी आम है और बंधक बनाने
की परंपरा है, जिसमें बड़े पैमाने पर महिलाओं के साथ यौन हिंसा भी होती
हैं। आमिर के दाह संस्कार की प्रक्रिया से समझा जा सकता हैं कि कितना
कठोर सामंती वर्चस्व है जो धार्मिक मान्याताओं का भी गला घोंट देता है।
मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक ंिहंसाग्रस्त गांवों की वह तस्वीर नहीं भूलनी
चाहिए, जिसमें सांप्रदायिक तत्वों को बचाने के लिए तमंचे, गड़ासा, पलकटी
आदि घातक हथियारों के साथ प्रर्दशन हुए। आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता
है कि जब भारतीय सेना उनके सामने नहीं टिक पा रही थी तो आम गरीब निहत्थे
मुसलमान जो उनके यहां खेतों में बंधुआ मजदूर की हैसियत रखता है, उसके
सामने वहां से भागने के सिवाए क्या रास्ता था? अगर हम अन्य सामंती ढाचों
की शिनाख्त करें, तो ऐसी तस्वीरें हमें बिहार में रणवीर सेना की सक्रियता
के समय भी दिखाई देती हैं।

अंग्रेजों के शासनकाल में कांग्रेस की यह मांग थी कि हिन्दुस्तानियों को
भी शस्त्र रखने का लाइसेंस दिया जाना चाहिए। अंग्रेजों के बाद दलितों के
खिलाफ सवर्णों के हमलों की घटनाओं के बढ़ने के साथ यह मांग की गई कि
दलितों को आत्म सुरक्षा के लिए हथियार के लाइसेंस मिलने चाहिएं। क्योंकि
उनकी सुरक्षा में तैनात पुलिस भी उनके खिलाफ खड़ी नजर आती रही है। बिहार
में कर्पूरी ठाकुर ने दलितों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने, लाइसेंस
देने और मुफ्त में शस्त्र मुहैया कराने का फैसला 1978 में बनी अपनी सरकार
के दौरान लिया था। देश भर में आत्म सुरक्षा का अधिकार केवल उन्हीं लोगों
के पास सुरक्षित है, जो बड़ी भूमि के मालिक हैं, जो धनवान हंै, जो बड़ी
जाति के हैं और उनमें से ज्यादातर बहुसंख्यक धर्म के सवर्ण समूह के सदस्य
हंै। जबकि हमले कमजोर वर्गों के खिलाफ होते हैं और उनमें दलित, आदिवासी,
पिछड़ों के अलावा अल्पसंख्यक होते हैं। दलितों के खिलाफ जाति के नाम पर
हमले होते हैं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ धर्म के नाम पर। सच्चर समिति
मानती है कि मुसलमानों के हालात दलितों से भी बदतर हैं, तो ऐसे में
मुसलमानों को आत्मरक्षा करने का अधिकार मिलना चाहिए। आजाद हिन्दुस्तान
में साम्प्रदायिक हमलों में उनकी सबसे ज्यादा जानें गई हंै और उनके घर
बर्बाद हुए हैं।

जो समाजशास्त्री चिंतत-मनन न करने के लिए कहकर इस धारणा को विकसित करने
का प्रयास करते हैं कि दंगे क्षणिक आक्रोश से जन्मते और लूटपाट के इरादे
से शामिल हुए असामाजिक तत्वों के कारण फैलते हैं, दरअसल वह सांप्रदायिक
सामंती वर्चस्व को बरकरार रख मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाना
चाहते हैं। जो सिर्फ सांप्रदायिक हिंसा पीडि़त होने पर ही नहीं बल्कि
विकास और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को तुष्टिकरण कहकर दूसरे वर्ग
को इनके विरुद्ध लामबंद करते हैं। जब यह प्रदेश सरकार मान रही है कि
गरीबी और ग्रामीण पृष्ठभूमि सांप्रदायिक हिसंा का कारण है तो उसके निवारण
के लिए उसे सामाजिक सुरक्षा के साथ आत्म रक्षा के सवाल को भी हल करना ही
होगा।

 

 

 

राजीव यादव

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...