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आमने - सामने

 

21अप्रेल 2013 संध्या 8.30बजे रामनवमी के शुभ अवसर पर पश्चिम बंगाल से आई
हुई नृत्यांगना अर्चना राही और रोशनी राही से युवा कथाकार संजय कुमार
'अविनाश' के द्वारा लिया गया साक्षात्कार । जो मुख्य रुप से नारी विमर्श
पर केन्द्रित है । नारी की गिरती दशा , नृत्य के आड़ मेँ शरीर बेचने का
कार्य पर विस्तृत चर्चा की गई । कई आडंबर को खुलासा करने पर विवश । झुठी
दलील के पीछे लड़कियोँ की झुकाव , शिक्षा के आभाव के कारण अपनी जीवन
कलात्मक न होकर दल-दल मेँ फंसती जा रही है । मात्र कुछ रुपियोँ के कारण
दिन रात शारीरिक के साथ साथ मानसिक श्रम से परेशान ।

 

अविनाश - सबसे पहले मैँ आपका नाम और संस्था का नाम जानना चाहूँगा ।
अर्चना - मेरा नाम अर्चना है और मैँ जय माँ आर्केस्ट्रा मेँ डांसिँग की
कार्य करती हूँ ।
अविनाश - आप कितने दिनोँ से इस कार्य मेँ लगे हुए हैँ और आपकी शिक्षा
कहाँ तक हुई है ?
अर्चना - पिछले एक वर्ष से इस कार्य मेँ लगी हुई हूँ और हमारी शिक्षा
दसवीँ पास है ।
अविनाश - आप क्या सोचेँ हैँ ? डॉसिंग के क्षेत्र मेँ आगे बढ़ पायेँगी ।
प्रत्येक क्षेत्र मेँ प्रतिस्पर्धा है एक से बढ़ कर एत कलाकार , अदाकारा
अपने जौहर के नाम से जाने जाते हैँ । इस संदर्भ मेँ आप अपना राय देँगी ।
अर्चना - मैँ चाहती हूँ कि डॉसिँग के क्षेत्र मेँ ही आगे बढ़ूँ । दूसरा
कोई विकल्प नजर नहीँ आती है । कई समस्याएँ हैँ जो मेरे तरह अदाकारा को
अवरुद्ध करने पर उतावला है । जहाँ तक अच्छे अदाकारा की बात है तो वे भी
मेरे तरह ही शुरुआत की होगी । छोटे - छोटे मंच से , गांवो - कस्वे मेँ
अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर आगे की मुकाम हासिल की है । मैँ भी आगे बढ़ूँगी
। यह दृढ़ संकल्प है ।
अविनाश - वे तो धनाढ़य परिवार से जुड़े हुए रहते हैँ । अच्छे संस्थान से भी
प्रशिक्षण लिए हुए रहती है । उसे हरसंभव आगे बढ़ने की ललक के साथ साथ सही
निर्देश भी प्राप्त होता है ।
अर्चना - ऐसी कोई बात नहीँ है । कई ऐसे अदाकारा व कलाकार है जो एकलव्य के
तरह गरीब परिवार से और बिना किसी प्रशिक्षण संस्थान से जुड़े रहकर अपना
नाम रौशन की ।

 

अविनाश - यह जो नृत्यकला है । आदिकाल से ही चलता आ रहा है । चित्रलेखा हो
या उमरावजान , अप्सरा हो या कोई नृत्यांगना । परन्तु आज के समय मेँ लोगोँ
को भद्दी और अश्लील दृष्टिकोण का सामना करना पड़ रहा है । जबकि यह स्पर्धा
नये युवा एवं युवतियां मेँ असीम उर्जा प्रदान करती है , खाश कर हेजिटेशन
का दूर करना एक नायाव मिशाल है ।
अर्चना - बिल्कुल आपने सही कहा । लोगोँ या दर्शकोँ की मानसिकता मेँ बदलाव
आई है । हमारी भी मजबूरी बनती है , फूहर गानोँ पर डॉँस करना । आज के
जमाने मेँ इस तरह के दृश्य देखने वालोँ मेँ अधिकांश युवा ही रहते हैँ ।
अच्छे व्यक्तित्व का जमावड़ा कम देखने को मिलती है और उन लोगोँ का ख्याल
रखते हुए , कोई भी कार्यक्रम मेँ खुद को ढ़ालनी पड़ती है । जिस क्षेत्र की
बात करेँ । हर जगह सिक्के के दोनो पहलू विद्दमान है - अनुशरण करना
दर्शकोँ का कर्तव्य है । मुझे तो अपनी अदा पर गुरुर है । मैँ गानो के
अनुसार , पहले से फिल्माया गया दृश्य के अनुसार अपनी काम करती हूँ । सच
कहा जाए तो एक मंच स्थित कलाकार को यह पसंद नहीँ कि कितने लोग गंभीर
मुद्रा मेँ हैँ बल्कि वह दृश्य हमेँ प्रफुल्लित और उर्जावान बनाती है कि
कितने दर्शक ताली की गड़गड़ाहट और खुश नजर आते हैँ । मैँ दर्शकोँ के
मनोरंजन के लिए आई हूँ न कि चिँतन के लिए ।
अविनाश - अभी आपकी उम्र भी बीस बाईस वर्ष की है । चाहेँ तो अपनी कैरियर
किसी और क्षेत्र मेँ बना सकती हैँ या ऐसा भी महसूस होता होगा कि भारतीय
नारी की अधिकांश ढ़ांचा , रहन-सहन जिस तरह से व्यतित होती आ रही है । उस
तरह रहेँ ।
अर्चना - अब भारतीय नारी खुद को बदलना सीख रही है । बंधन मुक्त तभी मानी
जाएगी जब पैसे हो । यही एक मजबूत बेड़ी है जो नारी को जीवन पर्यन्त पुरुषो
के साये से जकड़े रखा । मुझे ऐसा अनुभव हो रही है कि धीरे-धीरे बदलाव की
बयार चल चुकी है । जहाँ तक भारतीय नारी की रहन-सहन पहले के अपेक्षा अब
गाँव , घर मेँ भी अपने उपर निर्भर रहना सिखा दी और कदम से कदम मिलाकर चल
भी रही है ।
अविनाश - अर्चना जी । कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि जब आप अपना
कार्यक्रम प्रस्तुत करती हैँ तो कई अमानवीय नीति का सामना करनी पड़ती है ,
अंडे , टमाटर , ईँट , पत्थर वगैरह मंच पर फेँक कर अश्लील हरकत करने पर
उतारु हो जाता है । आप क्या महसूस करती हैँ ?
अर्चना - उस प्रस्थिति मेँ गुस्सा तो आती ही है परन्तु संस्थापक का आदेश
या अपनी कमी समझ कर चुप रह जाती हूँ ।

 

खुद मेँ महसूस करती हूँ कि मुझमेँ कुछ कमी रह गई तब ही इस तरह की हरकतेँ
देखने को मिलती है । पुनः हिम्मत करके मंच पर आती हूँ । इसे आप मजबूरी
कहेँ या दर्शकोँ का अवहेलना सहने की आदत ।
अविनाश - अब मैँ आपसे आखिरी सवाल कर रहा हूँ । आप जब किसी परेशानी की बजह
से मंच पर आना नहीँ चाहती हैँ या विरोध करती हैँ , उस समय आपके संस्थापक
की रवैया कैसी होती है ?
अर्चना - पूछिये मत । बंधुआ मजदूर से भी बद्दतर हालात के शिकंजे मेँ
महसूस करती हूँ । यहाँ तक की भद्दी-भद्दी गालियां भी सुननी पड़ती है । कई
बार थप्पड़ भी खाने को विवश हो जाती हूँ । खुद मेँ सोचती हूँ -अगर काम न
करुँ तो फिर आगे क्या होगा ? यही छत के नीचे रहना है , इन्हीँ लोगोँ के
छत्रछाया का एक मजबूत सहारा है । हर तरह की वेदना को सहते हुए अपने कार्य
मेँ लगी रहती हूँ । आखिर आजादी चयन की हूँ न ।
अविनाश - धन्यवाद अर्चना जी । आपने मुझे समय दिया । मैँ कहना चाहूँगा कि
हर आडंबर को तोड़कर आगे बढ़ेँ । ऐसी कोई जंजीर या मजबूरी नहीँ है कि जकड़े
रहे । नारी होने के नाते अश्ळीलता से दूर रहेँ और आने वाली पीढ़ी को
सुसंस्कृत संदेश देँ । सफलता कदम चूमेगी । बहुत बहुत बधाई ।

 

 

अर्चना राही
रोशनी राही
नृत्यांगना
पश्चिम बंगाल
के साथ
युवा कथाकार
संजय कुमार अविनाश
लखीसराय बिहार ।

 

 

 

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