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बाबू गुलाबराय स्मृति दिवस समारोह--डां नन्दलाल भारती

 

 

बाबू गुलाबराय स्मृति दिवस समारोह सम्पन्न

 


इंदौर/इंडियन सोसायटी आफ आथर्स,इंदौर चैप्टर द्वारा बाबू गुलाबराजी के 125वे जन्मदिवस को स्मृति दिवस के रूप में दिनांक 30.05.2014,दुआ सभागार में धूमधाम से मनाया गया। स्मृति दिवस के अवसर पर बाबू गुलाबराजी व्यक्तित्व,कृतित्व एवं हिन्दी साहित्य के उत्थान में उनके अवदान पर उनके नाती एवं इंसा इंदौर चैप्टर के कोशाध्यक्ष,श्री वाई.के गुप्ता ने कहा कि बाबू गुलाब राय का जन्म 17 जनवरी 1888 को इटावा,उत्तर प्रदेष में हुआ था। वे आगरा कालेज से बी.ए.की परीक्षा पास किये एवंएम.ए.दर्षन षास्त्र में कर छतरपुर चले गये । वहां के महाराजा के निजी सचिव हो गये। बाबूगुलाबराय छतरपुर में दीवान और चीफ जज भी रहे। छतरपुर महाराजा के निधन के बाद आगरा आ गये।आगरा आकर सेंट जान्स काले में हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यभार ग्रहण कर लिये। बाबू गुलाबराय के सम्मान में भारतीय डाकतार विभाग ने वर्श 2002 में डाक टिकट भी जारी किया है। आगरा विष्वविद्याालय ने समय के पुत्र बाबूगुलाब राय को डी.लिट. की उपाधि भी प्रदान कर सम्मानित कर चुका है। बाबूजी आजीवन हिन्दी साहित्य के उत्थान के लिये कार्य करते रहे। आपने बताया कि मेरा लालन-पालन बाबूजी के सानिघ्य में हुआ।बाबू के साथ बडे़-बड़े साहित्यिक कार्यक्रमों में जाने एवं मूर्धन्य सााहित्यकारों से व्यक्तिगत् रूप से मिलने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। श्री वाई.के गुप्ता की पुत्र-बहू श्रीमती विभा गुप्ता ने अपनी दादी सास द्वारा अपने पिताश्री बाबूगुलाबराय की याद में लिखी कविता-ऐसे थे मेरे पिताजी फूलगुलाब..........का पाठ किया।

 

 


हिन्दी परिवार के अध्यक्ष,श्री हरेराम वाजपेयी ने बाबूगुलाबरायजी को याद करते हुए कहा कि बाबूगुलाब राय को याद करना हिन्दी साहित्य को सम्वृद्ध करना है। अपने कहा कि बाबूगुलाबराय की दार्षनिक रचनायें उनके गम्भीर अध्ययन और चिन्तन की परिचायक है। बाबूगुलाब राय की रचनाओं में विवेचनात्मक, भावात्मक,हास्य और विनोदपूर्ण षैली के दर्षन होते है। नवरस,हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास,हिन्दी नाट्य विमर्ष,आलोचना कुसुमांजलि काव्य के रूप,सिद्धान्त और अध्यन आदि आलोचनात्मक कृतियां है। कर्तव्य षास्त्र,तर्क षास्त्र,बौद्धधर्म पष्चात दर्षनों का इतिहास,भारतीय संस्कृति की रूपरेखा,दर्षनात्मक उनकी कृतियां है। आपने बाबूजी की व्यंग रचनाओं का भी जिक्र किया। आपने कहा कि बाबूजी कविता कहानी एवं अन्य विधाओं में लेखन किया है परन्तु उनकी पहचान निबन्धकार के रूप में सदैव याद की जाती रहेगी
तदोपरान्त इंसा,इंदौर चैप्टर के संरक्षक डां.अजीत कुमार सिंह कासलीवाल,जिन्हें फिल्म जगत ने विगत् दिनों उनके सिनेमा जगत के उत्थान के लिये दादा साहब फालके सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर इंसा चैप्टर द्वारा डां.अजीत कुमार सिंह कासलीवाल सम्मान किया गया। अपने उद्बोधन मे डां.अजीत कुमार सिंह कासलीवाल ने कहा कि मैं विगत् 50 वर्शो से सिनेमा जगत् से जुड़ा हुआ हूं। मैं आजीवन जांतिपांति से उपर उठकर कार्य करने के लिये प्रतिबद्ध रहा हूं। मैं तन-मन-धन से मानव एवं साहित्य सेवा करने के लिये सदैव तैयार रहता हूं। श्रीमती ज्योति जैन ने कहां कि डां.कासलीवाल सादा जीवन उच्च विचार पर चलने वाले व्यक्ति है। आप एक प्रतिश्ठित उद्योगपति,समाजसेवक एवं साहित्यसेवी है। आप रचनाकारों की मदद के लिये हमेषा तैयार रहते है। प्रषस्ति पत्र का वाचन चैप्टर के उपाध्यक्ष, डां.के.एस.रावत ने किया। इस अवसर पर डां.अजीत कुमार सिंह कासलीवाल की सुपुत्री अनुपमा जैन ने अपने पिताश्री के सम्मान में- नये कमरों में पुरानी चीजें कौन रखता है,परिन्दों को पानी कौन रखता है,बुजुर्गो का ख्याल कौन रखता है................ रचना का पाठ किया।

 

 


कार्यक्रम के अन्तिम चरण में मीडिया से साहित्य का निवार्सन और समाज में बढ़ती संवेदनहीनता विशय पर आयोजित चर्चा में प्रसिद्ध पत्रकार श्री चिन्मय मिश्रा ने कहा कि इंदौर हम देवी अहिल्या की कर्मभूमि इंदौर में बैठे हुए है। इंदौर से ही महात्मा गांधी ने हिन्दी को राश्ट्रभाशा बनाने का अभियान प्रारम्भ किया था परन्तु आष्चर्य का विशय है कि इंदौर के प्रसिद्ध देवी अहिल्या विष्वविद्यालय में हिन्दी भाशा विभाग नही है। जैसकि साहित्य एक षाष्वत संपदा है और समाचार पत्र/ मीडिया तात्कालिक या क्षणिक या नाषवान माध्यम है। हम जान गये है कि पूरी पत्रकारिता स्पाट रिर्पोंटिंग पर आकर रूक गयी है। बदलते वक्त में हमें साहित्य की स्थिति और साहित्य के स्तर पर भी नजर रखना होगा। एक ओर षिक्षा के बदलते स्वरूप ने विवेचनात्मक दृश्टिकोण से किनारा कर लिया है। मुद्रण और प्रकाषन में अन्तर ही नही बचा है। दो दषक पहले हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य का एक महत्वपूर्ण अनुश्ंाग होता था, धीरे-धीरे कमी आती रही अब तो हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाओं से हिन्दी साहित्य का पन्ना ही गायब सा हो गया है परन्तु अंग्रेजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अंग्रेजी साहित्य और कला को स्थान मिल रहा है। दूरसंचार क्रान्ति के इस दौर में अब नागरिक पाठक या श्रोता नही रहे है अब मीडिया की नजर उपभेक्ता बन गये है। समाचार पत्रो ने अपनी भूमिका को विज्ञापन प्रर्दषनकर्ता के रूप में बदल लिया है। भारत की आजादी में हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने अहम भूमिका निभाया है। महात्मा गांधी सम्पादन का कार्य करते थे। मीडिया से साहित्य के निवार्सन का अर्थ ये कतई नही है कि समाज से साहित्य का निर्वासन हो गया है,भारतीय समाज में साहित्यिक जीतिव है और सदा रहेगा। प्रेमचचन्द,खुषवन्त सिंह,मुक्तिबोध,बाबूगुलाबराय,हरीषंकर परसाई एवं अन्य पुराने रचनाकार पढ़े जा रहे है,बदलते दौर में नयें रचनाकारो को भी पढ़ने और समझने की जरूत है। मीडिया से साहित्य के निर्वासन से यकीनन समाज में संवेदनहीता बढ़ी है संवेदनहीनता और विस्तृत नही हो इसके लिये सचेत होने की जरूत है,साहित्य से नयी पीढ़ी को जोड़ने की जरूरत है।

 


मीडिया से साहित्य के निर्वासन से समाज से साहित्य का निर्वासन नहीं हुआ है। श्री चिन्मय मिश्रा की परिचय सुश्री नीतू जोषी नेे दियातथा स्वागत मुख्य वक्ता श्री चिन्मय मिश्र का स्वागत वरिश्ठ लघुकथाकार श्री सुरेष सर्मा ने किया। संस्था अध्यक्ष फादर वर्गीस अलेंगाडन ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि इंसा का हमेषा से प्रयास रहा है कि समाज हित में चिन्तन कार्य निरन्तर जारी रहे।साहित्यिक रचनाओं की प्रस्तुति एवं संगोश्ठियों का आयोजन होता रहे। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को संवृद्ध बनाये रखने के लिये साहित्यिक अनुश्ठान जरूरी है।रचनाकार एक मंच पर आने की जरूरत है,यह साहित्यिक संस्थायें कर सकती है।इंसा प्रयासरत् है। साहित्य समाज का दर्पण होता है,साहित्य को हमें अगली पीढ़ी को और अधिक संवृद्ध कर हस्तान्तरित करने का प्रयास करना होगा। आपने इंदौर के रचनाकारों को इंसा से जुडकर साहित्य सृजन कर उसे पाठकों श्रोताओं तक पहुंचाने का भी आह्वाहन किया। चिन्मय मिश्रा, डां.नन्दलाल भारती, फादरवर्गीस अलंेगाडन,डां.अजीकुमारसिंह कासलीवाल, डां.के.एस.रावत,सुरेष पाण्डया मंचासीन थे। इस कार्यक्रम में श्री सूर्यकान्त नागर,प्रदीप,नवीन,सदाषिव कौतुक, डां. सरोजकुमार, विक्रम कुमार,राजेन्द्र भारतीय,एस.एच.पिठवे,वेदहिमांषु,साहित्यकार, पत्रकार एवं श्रोतागण सहित,इंसा सदस्य उपस्थित थे । कार्यक्रम राश्ट्रगीत के साथ सम्पन्न हुआ । कार्यक्रम का संचालन ज्योति जैन किया तथा आभार श्री सुरेष पाण्डया ने माना।

 

 



डां नन्दलाल भारती

 

 

 

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