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राष्ट्रीय बाल साहित्यकार सम्मेलन 2 व 3 अक्टूबर 2016

 

 

balsahitya

 

 

अखिल भारतीय काव्य गोष्ठी सत्र:
इस सत्र का संचालन का भार तनिमा की संपादिका एवं कवयित्री शंकुतला सरूपरिया ने किया। लगभग 5 बजे इस काव्य गोष्ठी का प्रारंभ राजेन्द्र स्र्वणकार की सरस्वती वंदना के सुमुधर स्वर से आरंभ हुआ। सलिला की सदस्य रही शकुंतला सोनी ने ‘अनकही पीड़ा पत्नी की’ व्यंग्य कविता से इस सत्र को गति दी। चित्तौड़गढ़ के नन्द किषोर ‘निर्झर’ ने देषभक्ति की रचना ‘हमारा प्यारा हिन्दुस्तान, रंग बिर्रगा आंख का तारा हिन्दुस्तान’ बाल कविता पढ़कर सभी को राष्ट्रप्रेम से सरोबार कर दिया। लखनऊ इलाहबाद बैंक के मुख्य प्रबंधक राजेष्वर वषिष्ठ जो कि पौराणिक विषयों को लेकर लेखनरत है यां भी उन्होंने नवरात्री पर नव दुर्गाओं की प्रासंगिता पर छंद मुक्त रचना पढ़ी। प्रतापगढ़ से आयी पुष्पा जांगिड़ ‘कीर्ति’ ने राजस्थानी की दो गजले पढ़ी- ‘रिष्ते में अब ज्यान कठै, स्वारथ रो बाजार अठै’। प्रतापगढ़ के मषहूर टी. वी. गायककार हरीष व्यास ने गीत ‘मेरी फितरत है कि मैं तुझसे प्यार करूं’ पढ़ा। सलिला की वरिष्ठ सदस्या मधु माहेष्वरी ने ‘मनभावन मधुमास आया’ गीत पढ़कर गर्मी के उमस भरे माहौल में शीलतलता भर दी। सुधाकर अदीब ने गीत ‘नष्वर संसार में तेरे गीत कहां से गाता’ गाकर आध्यात्मिक रंग का उजास भर दिया।
विज्ञान पहेली बाल साहित्य लेखक उदयपुर के प्रकाष तातेड़ ने ‘कविता का सामथ्र्य’ अपनी सषक्त रचना पढ़ी। भोपाल से आयी प्रीति प्रवीण ने ‘मां’ महिमा पर मार्मिक कविता पढ़कर पूरे माहौल को भावनामय कर दिया। सलिला के वरिष्ठ साथी भीलवाड़ा से आये प्रहलाद पारीक ने दोहे गजल के रंग बिखेरे कुछ इस तरह- ‘आती मुसीबते किसी मेहमान की तरह’।
सूफी गजलकार एस.के. लोहानी ने ‘जीना मरना’ शीर्षक की कविता पढ़कर काव्य संगोष्ठी को एक नया रंग दिया। बीकानेर की रहने वाली संगीता सेठी ने ‘हमने तो कविताएं लिखकर दो-दो हाथ किए सनम से’ खूब गुदगुदाया। सलिला कार्यषाला की देन बालिका साक्षी तंवर ने ‘मेवाड़ की धरती, बलिदान की धरती’ पढ़ी। गजल में वर्तमान परिवेष को ‘अपनो से अपनो के आभार गुम हुए’ गाते हुए पेष किया भोपाल की कीर्ति श्रीवास्तव ने। सलिला के पूर्व उपाध्यक्ष रहे नारायण टेलर ने अपनी चिर परिचित मुद्रा में चिर परिचत कविता ‘सिलाई मेरा पुष्तैनी हुनुर है’’ सुनाकर देषभक्ति की भावना उजागर की। दौसा निवासी एवं मथुरा से आये युवा रचनाकार अंजीव ‘अंजुम’ ने प्रेम व देषभक्ति से सरोबार गजल ‘खूबसूरत वो पैरो की जंजीर है’ पढ़ी। सलिला के सदस्य शंकरलाल पाण्डे ने ‘मेरा गांव’ शाीर्षक से कविता पाठ किया। सलिला संस्था सचिव मुकेष राव ने स्वच्छ भारत अभियान पर अपनी रचना पढ़ी। किषोर श्रीवास्तव गजल और पैरोडी सुनाये ‘जहां नुक्सान हो मेरा तुम नियम बना लेते हो’। मंजु महिमा ने अपनी बोनसाई कविताओं में नारी को तुलसी, गुलाब, मनीप्लांट आदि से जोड़कर काव्य व्याख्या की। ‘जाओ अपनी मां के करीब जाओ’ सुनाकर मां के प्रति व्यवहार को कविता के माध्यम से उजागर किया। महेष बुनकर, स्थानीय युवा रचनाकार ने दो मुक्तक सुनाये। उमेष त्रिवेदी ने अपने आध्यत्मिक संस्मरण सुनाये। बीकानेर की विद्युत विभाग की सहायक अभियन्ता आषा शर्मा ने विक्रम बेताल के प्रतीक से स्त्री पुरूष संबंधों पर अनेक प्रष्न उठाये। राजकुमार ‘राजन’ ने छंद मुक्त कविताओं के माध्यम से जीवन की विसंगतियों को प्रकट किया। चांद मोहम्मद घोसी ने काव्यमय भानाएं व्यक्त की। रजनीकांत शुक्ल ‘रावण तुम मरे नही, अभी जिन्दा हो’ तथा शास्त्री जी के जीवन पर रचना सुनायी।
कविताआंे के इस लम्बे दौर को थामते हुए वयोवृद्ध बीकानेर से आये रचनाकार नरपतसिंह सांखला ने ‘सावन की बरखा’ राजस्थानी गीत गाकर मनोरम दृष्य प्रस्तुत कर दिया। इस काव्य गोष्ठी के अंत में संचालिका शकुंतला सरूपरिया ने ‘बेटियां किसने कहा गरीब होती है’ अपनी सुरली आवाज में गाकर सभी को रसमय कर दिया। यह सत्र 8 बजे बाद समाप्त कर दिया गया।

 

 

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